निजीकृत केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र के उद्यमों के संबंध में संक्षिप्त टिप्पणियां

क्र.सं.निजीकृत केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र के उद्यम
1 भारत एल्युमिनियम कंपनी लि. (बालको)
2 सीएमसी लि. (सीएमसी)
3 हिन्दुस्तान जिंक लि. (एचजैडएल)
4 एचटीएल लि. (एचटीएल)
5 इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कार्पोरेशन लि. (आईपीसीएल)
6 इंडो-होक्के होटल्स लि. (एचसीआई की सहायक कंपनी)
7 जैसप एंड कंपनी लि.(बीबीयूएनएल की सहायक कपनी)
8 मारूति उद्योग लि. (एमयूएल)
9 मॉडर्न फूड इडस्ट्रीज लि. (एमएफआईएल)
10 पारादीप फॉस्फेट्स लि. (पीपीएल)
11 पंजाब होटल्स लि. (आईटीडीसी की सहायक कंपनी)-अपूर्ण चंडीगढ़ परियोजना
12 विदेश संचार निगम लि. (वीएसएनएल)
13 होटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की दो होटल इकाइयां*
14 भारत पर्यटन विकास निगम लि. (आईटीडीसी) की 17 होटल इकाइयां**
15 आईटीडीसी की एक होटल इकाई (30 वर्षीय पट्टा-सह-प्रबंधन नियंत्रण पर देय)***
16 लगन जूट मशीनरी कंपनी लि. (एलजेएमसी) (भारत भारी उद्योग निगम लि., जो इसके बाद बीबीयूएनएल के रूप में जानी जाती है, की सहायक कंपनी)

टिप्पणीः आईबीपी की 33.58% इक्विटी आईओसी को बेची गई थी। सामरिक बिक्री के बाद आईबीपी की 53.58% इक्विटी आईओसी के पास थी। इसलिए आईबीपी केन्द्रीय सार्वजनिक क्षेत्र का एक उद्यम बनी रही।

निजीकृत होटलों की सूची:

* होटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की होटल इकाइयां

1.

संतूर होटल मुम्बई एयरपोर्ट

2.

होटल जुहू, मुम्बई

**भारत पर्यटन विकास निगम लि. की होटल इकाइयां

1.

होटल आगरा अशोक

2.

होटल मदुरै अशोक

3.

होटल बोधगया अशोक

4.

होटल हसन अशोक

5.

टीएबीआर, मामल्लापुरम

6.

कुतुब होटल, नई दिल्ली

7.

लोधी होटल, नई दिल्ली

8.

एलवीपीएच, उदयपुर

9.

होटल मनाली अशोक

10.

केएबीआर, कोवलम

11.

होटल औरंगाबाद अशोक

12.

होटल एयरपोर्ट अशोक, कोलकाता

13.

होटल खजुराहो अशोक

14.

होटल वाराणसी अशोक

15.

होटल कनिष्क, नई दिल्ली

16.

होटल इन्द्रप्रस्थ नई दिल्ली

17.

होटल रणजीत

***होटल अशोक बंगलोर (30 वर्षीय पट्टे पर दिया गया)

भारत एल्युमिनियम कंपनी लि. (बालको)

बालको पूर्ण रूप से एकीकृत एल्युमिनियम उत्पादक कंपनी है, जिसकी अपनी स्वयं की कैप्टिव खानें हैं, एक एल्युमिना रिफाइनरी है, एक एल्युमिनियम स्मेलटर है, एक कैप्टिव पावर प्लांट है और डाउंसट्रीम फेब्रिकेशन सुविधाएं हैं। इसकी स्थापना 1965 में की गई थी और इसका निगमित कार्यालय नई दिल्ली में है। इसका मुख्य संयंत्र और सुविधाएं कोरबा छत्तीसगढ़ में स्थित है। इसकी एक फेब्रिकेशन इकाई विधानबाग (पश्चिम बंगाल) में भी है। बालको की रिफाइनिंग क्षमता 2 लाख टन प्रतिवर्ष है और इसकी स्मेलटिंग क्षमता 1 लाख टन प्रतिवर्ष है। 02 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार इसके कर्मचारियों की संख्या 6,436 थी।

विनिवेश से पहले बालको में भारत सरकार की शेयरधारिता शतप्रतिशत थी। 1997 में, विनिवेश आयोग ने बालको को विनिवेश के उद्देश्य के लिए एक गैर-महत्वपूर्ण की श्रेणी में वर्गीकृत किया था और एक सामरिक भागीदार के पक्ष में सरकार की शेयरधारिता में से 40% इक्विटी के तत्काल विनिवेश और सामरिक बिक्री के दो वर्षों के अंदर घरेलू सार्वजनिक पेशकश के माध्यम से सरकारी शेयरधारिता को और कम करके 26% तक करने की सिफारिश की थी। आयेाग ने इसके अलावा, भावी उपयुक्त समय पर शेष समस्त शेयरधारिता के विनिवेश की सिफारिश की थी। मंत्रिमंडल ने सामरिक बिक्री के माध्यम से 40% इक्विटी के विनिवेश और इसके बाद पूंजी बाजार के माध्यम से और विनिेवेश करने की विनिवेश आयेाग की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था।
 
इसके बाद, वर्ष 1998 में विनिवेश आयोग ने अपनी सिफारिशों में संशोधन किया और सरकार को यह सलाह दी कि सरकार किसी सामरिक क्रेता के पक्ष में 51% इक्विटी के विनिवेश के साथ-साथ प्रबंधन के हस्तांतरण पर विचार करे जिसे मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार कर लिया गया था। इसके बाद, सरकार ने किसी सामरिक क्रेता के पक्ष में बालको की 51% भागीदारी की बिक्री में सहायता करने के लिए मैसर्स जॉडिन फ्लेमिंग केा सलाहकार के रूप में नियुक्त किया था।

 
इसके साथ-साथ सरकार के ध्यान में यह भी लाया गया था कि बालको के पास 489 करोड़ रुपए की विशाल इक्विटी है और 424 करोड़ रुपए के लगभग बड़ी मात्रा में अप्रयुक्त मुक्त रिजर्व है। खान मंत्रालय द्वारा यह सुझाव दिया गया था कि विनिवेश से पहले बालको की इक्विटी को उसके प्रचुर नकदी सरप्लस का उपयोग करते हुए उसकी इक्विटी को 50% तक कम किया जाए। इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया गया था। इसके परिणामस्वरूप, सरकार को बालको की पूंजी पुनर्संरचना से 244 करोड़ रुपए और विनिवेश से पूर्व इस राशि पर कर के रूप् में 31 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे।
 
सरकार के पहले निर्णय के बाद बालको की सामरिक बिक्री प्रक्रिया वर्ष 1997 के आखिर में आरंभ हुई थी और अततः 2 मार्च, 2001 को समाप्त हो गई थी। 51% भागीदारी की बिक्री उच्चतम बोलीदाता स्टरलाइट इंडस्ट्रीज को बेची गई थी जिससे सरकार को 551.50 करोड़ रुपए प्राप्त हुए थे। प्राप्त मूल्य उस मूल्य से अधिक था जो उपयेाग की गई विभिन्न मूल्यांकन पद्धतियों द्वारा दर्शाया गया था। इस प्रकार, व्यस्ततम एल्युमिनियम सायकल के दौरान 51% शेयरों पर लाभांश के रूप में मिलने वाले लगभग 10 करोड़ रुपए की तुलना में सरकार को इस निजीकरण से 827.50 करोड़ रुपए प्राप्त हुए।
 
बिक्री के बाद बालको के विनिवेश के संबंध में विभिन्न हल्कों से अनेक प्रश्न उठाए गए, जो खासकर पारदर्शिता, मूल्यांकन और कर्मचारियों के हित संरक्षण से संबंधित है। तथापि, सलाहकार की नियुक्ति और बोली मूल्य के अनुमोदन सहित समस्त बिक्री प्रक्रिया वैश्विक परिपाटियों के उच्चतम मानकों को ध्यान में रखते हुए अत्यधिक पारदर्शी तरीके से संपन्न की गई थी। सामरिक क्रेता के साथ किए गए शेयरधारक करार में वह खण्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमे नौकरी की सुरक्षा और पृथक्करण लाभ के संबंध में सभी स्तरों पर कर्मचारियों को पर्याप्त संरक्षण की पेशकश की गई थी।
  निजीकरण के बाद बालको की स्थिति

  1. नए प्रबंधन ने 31 जुलाई, 2001 से 16 अगस्त, 2001 तक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना लागू की थी। 981 आवेदन (151 कार्यकारी अधिकारियों से और 830 कामगारों से) प्राप्त हुए थे। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के 694 पुराने आवेदन भी लंबित थे। कुल मिलाकर 956 आवेदन स्वीकार किए गए थे जो अधिकतर उन इकाइयों से थे जो बंद पड़ी थी।
     
  2.   2001 में कर्मचारियों की हड़ताल के कारण 200 करोड़ रुपए की हानि उठाने के बावजूद सभी कर्मचारियों को 5,000 करोड़ रुपए की अनुग्रह राशि का भुगतान किया गया था।
     
     
  3. 07 अक्तूबर, 2001 को पांच वर्ष की अवधि के लिए एक दीर्घकालीन वेतन करार (वेतन संशोधन 01 अप्रैल, 1999 से देय था और पिछला संशोधन 10 वर्षों के लिए वैध था) निम्न प्रकार संपन्न किया गया था।  
     
  • कामगार को मूल वेतन के 20% की दर पर निश्चित लाभ मिले
  • भत्तों में बढ़ोत्तरी;  
     
    • रात्रि पारी भत्ता; 10 रुपए से 20 रुपए प्रति पारी
    • कैंटीन भत्ता; 400 रुपए प्रतिमाह (रियायत कैंटीन सुविधा के स्थान पर)
    • शिक्षा भत्ता; 50 रुपए से 75 रुपए प्रतिमाह
    • होस्टल भत्ता; 150 रुपए से 200 रुपए प्रतिमाह
    • मेधावी बच्चों की छात्रवृत्ति राशि दोगुनी की गई
    • छुट्टी यात्रा सहायता लगभग 6,000 रुपए नकद प्रतिवर्ष
    • परिवहन भत्ता; स्कूटर उपयुक्तता 400 से 500 रुपए प्रतिमाह, मोपेड उपयुक्तता 240 से 350 रुपए प्रतिमाह, अन्य उपयुक्तता 150 से 260 रुपए प्रतिमाह  
       
  1. लागू की गई नई परिपाटियां
  • काम की अदला-बदली
  • मूल्यांकन प्रणाली
     
  1. नए प्रबंधन ने 6,000 करोड़ रुपए के निवेश के प्रस्ताव किया जिससे उत्पादन चार गुना बढ़ जाएगा।

बालको के विनिवेश में महत्वपूर्ण निर्णय    
बालको के विनिवेश के विरोध में कामगार 67 दिवसीय हड़ताल पर चले गए थे। बालको के विनिवेश के विरोध में फरवरी, 2001 में तीन रिट याचिकाएं – 2 दिल्ली उच्च न्यायालय में और 1 चंडीगढ़ उच्च न्यायालय में दायर की गई थी। उच्चतम न्यायालय ने 10 दिसंबर, 2001 को दिए गए अपने सर्वसम्मत निर्णय में भारत सरकार द्वारा किए गए बालको के विनिवेश को वैध ठहराया था। अन्य के साथ-साथ इस महत्वपूर्ण निर्णय में सरकार की आर्थिक नीति संबंधी मामलों की न्यायिक समीक्षा के मापदंडों को भी परिभाषित किया गया था। बालको के विनिवेश को वैध ठहराते हुए और याचिकाओं को खारिज करते हुए माननीय उच्च्तम न्यायालय ने यह टिप्पणी की थी कि "इस तथ्य के अलावा कि विनिवेश नीति पर प्रश्नचिन्ह ऐसे ही नहीं लगाया जा सकता, उसके तथ्य दर्शाते हैं कि इस विनिवेश को संपन्न करने में उचित न्यायसंगत और साम्यिक क्रियाविधि अपनाई गई है" इस निार्णय से आगे सफल निजीकरणों की राह अपनाने में सहायता मिली ।

सीएमसी लिमिटेड
 
कंपनी
 
 

सीएमसी लि. मुख्य तौर पर हार्डवेयर मेंटेनेंस, सिस्टम इंजीनियरिंग, सिस्टम डिजाइन, विकास, परामर्श और नेटवर्किंग के कार्य में लगी हुई है। इसकी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी, बैटन रॉग इंटरनेशनल इंक, अमेरिका में है  
निजीकरण से पूर्व सीएमसी लि. की स्थिति

अधिकृत पूंजी (31 मार्च, 2001 को)

35 करोड़ रुपए

प्रदत्त पूंजी (31 मार्च, 2001 को)

15.15 करोड़ रुपए

सरकारी इक्विटी धारिता

83.31%

कर्मचारियों की संख्या

3200 ( लगभग)

वित्तीय विशेषताएं:                                                              (सभी आंकड़े करोड़ रुपए में)

विवरण

1997-98

1998-99

1999-00

2000-01

टर्नओवर

295.90

346.20

468.70

553.30

करोपरांत लाभ

6.90

7.30

12.70

25.09

निवल मूल्य

40.30

45.70

54.80

74.70

ऋण

42.70

34.20

40.60

34.14

सकल अचल परिसंपत्तियां

97.00

98.90

109.30

122.00

51% शेयरों पर प्रदत्त लाभांश *

0.77

0.77

1.52

2.55

* यदि भारत सरकार 152 करोड़ रुपए के बिक्री मूल्य पर 10% अर्जित करती है तो उसे पिछले चार वर्षों में 1.42 करोड़ रुपए के औसत लाभांश की तुलना में 15.2 करोड़ रुपए का वार्षिक ब्याज मिलेगा।
 
  विनिवेश प्रक्रिया  
  सरकार का अनुमोदन

  • अगस्त, 1990 में सरकार ने सीएमसी की अधिकृत पूंजी को 35 करोड़ रुपए तक बढ़ाने तक अनुमोदन किया और यह अतिरिक्त इक्विटी पूंजी बाजार से जुटाई जानी थी। सरकार ने यह भी निर्णय लिया था कि सीएमसी में उसकी धारिता 60% से कम नहीं होनी चाहिए।
  • वर्ष 1992 में सरकार ने 16.69% इक्विटी का विनिवेश किया।
  • अप्रैल, 1999 में सीएमसी को विनिवेश आयोग को संदर्भित किया गया था लेकिन इसका नाम वापस ले लिया गया था क्योंकि सरकार ने यह निर्णय लिया था कि अतिरिक्त इक्विटी निजी व्यवस्था या सीधे सार्वजनिक निर्गम के द्वारा जुटाई जाए।
  • सीएमसी लि. निजी व्यवस्था या सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से नवंबर, 2000 तक निधियां नहीं जुटा पाईं।
  • 01 फरवरी, 2001 को सरकार ने सामरिक भागीदार को शामिल करके और अन्य माध्यमों से अपनी इक्विटी को 26% तक कम करने का निर्णय लिया।

हित की अभिव्यक्ति

  • हित की अभिव्यक्तियां फरवरी-मार्च, 2001 में आमंत्रित की गई थी और 14 पार्टियों (घरेलू और अतर्राष्ट्रीय) ने सीएमसी लि. में भागीदारी हासिल करने की इच्छा जताई।
  • तीन गैर संजीदा पार्टियों ने डाटा कक्ष का दौरा किए बिना अपना नाम वापस ले लिया।
  • 6 पार्टियों ने डाटा कक्ष के अध्ययन के दूसरे दौर से पहले अपना नाम वापस ले लिया।
  • उचित अध्ययन के दूसरे दौर के संपन्न होने के बाद एक पार्टी बाहर हो गई।
  • मैदान में सिर्फ चार पार्टियां बच गई जो संजीदा बोलीदाता लगते थे।
  • अंततः दो पार्टियों ने ही अपनी तकनीकी और वित्तीय बोलियां भेजी। तथापि, एक बोलीदाता गैर-अनुपालक पाया गया क्योंकि इसने अपेक्षित बैंक गारंटी प्रस्तुत नहीं की थी।
     

बोली तथा पेशकश किए गए मूल्य का मूल्यांकन सीएमसी लि. का मूल्यांकन सीएमसी लि. के शत-प्रतिशत इक्विटी शेयरों का विभिन्न पद्धतियों द्वारा किया गया मूल्यांकन इस प्रकार हैः

क्र.सं.

मूल्यांकन की पद्धति

करोड़ रुपए

1.

डिस्काउंटेड कैश फ्लो पद्धति

213.49

2.

परिसंपत्ति मूल्यांकन पद्धति

37.58

3.

तुलन-पत्र पद्धति (बीएसएन)

72.74

4.

तुलनीय कपनियां पद्धति (सीसीएम)

102.53

  • मूल्यांकन समिति ने सीएमसी की 51% इक्विटी का न्यूनतम मूल्य/आरक्षित मूल्य डीसीएफ पद्धति के आधार पर 108.88 करोड़ रुपए तय किया।
  • टाटा संस लि. ने सीएमसी लि. की 51% भागीदारी 152 करोड़ रुपए में हासिल की।
  • प्रकल्लित किया गया प्रतिशेयर मूल्य लगभग 197 रुपए था।

सीएमसी के लिए कर्मचारी स्टॉक विकल्प योजना

  • सरकार ने कर्मचारी स्टॉक विकल्प की येाजना के अंतर्गत कर्मचारियों को सीएमसी लि. के 6.31% इक्विटी शेयरों के आबंटन का अनुमोदन किया।
  • 01 सितंबर, 2001 की स्थिति के अनुसार सहायक कंपनी [बैटन रॉग इंटरनेशनल इंक, अमेरिका (बीआरआई-यूएसए)] सहित कंपनी के मौजूदा नियमित कर्मचारी इसमें भाग लेने के लिए पात्र होंगे।
  • कर्मचारियों को शेयरों की पेशकश ग्रेडेड तरीके से की जाएगी।
  • आबंटित शेयर आबंटन की तारीख से एक साल की अवधि के लिए बेचे नहीं जा सकेंगे।
  • शयरों की पेशकश "सूचीबद्ध बाजार मूल्य” (औपचारिक पेशकश की तारीख से 30 दिन पहले तक बीएसई/एनएसई के अंतिम मूल्य का औसत) के एक तिहाई मूल्य पर या प्रतिशेयर सामरिक बिक्री मूल्य के एक तिहाई मूल्य, इनमें से जो भी कम हो, पर की जाएगी।
    पिछले तीन वर्षों के लिए बीएसई आईटी सूचकांक में कुछ कपनियों के मूल्य अर्जन अनुपात (पीई अनुपात) इस प्रकार हैं।  

कंपनी

सार्वजनिक शेयरधारिता (% में)

मूल्य/अर्जन (सितंबर, 2001)

विप्रो लि.

                9

          31

इंफोसिस टेक्नोलॉजिस लि.

              25

          23

सीएमसी लि.

                4

          18

सत्यम कंप्यूटर सर्विसेज लि.

              17

          10

हग्स साफ्टवेयर सिस्टम्स लि.

                8

            9

टाटा अलेक्सी लि.

              56

            8

एचसीएल टेक्नोलॉजिस लि.

                6

            8

मास्टेक लि.

              20

            6

टाटा इंफोटेक लि.

              15

            6

पोलरिज साफ्टवेयर लैब लि.

              25

            5

पीएसआई डाटा सिस्टम्स लि.

              26

            4

ज्योमैट्रिक साफ्टवेयर सोल्युशंस कं.लि.

              31

            3

सोनाटा साफ्टवेयर लि.

              42

            3

एच सी एल इंफोसिस लि.

              27

            3

विजुअलसॉफ्ट टेक्नोलॉजिज लि.

              18

            2

एनआईआईटी लि.

              10

            2

डिजिटल ग्लोबलसाफ्ट लि.

                                      
सिल्वरलाइन टेक्नोलॉजिस लि.

              19
              27

            2
            2

शेरा ऑप्टिमा लि.

              39

            1

स्रोतः 1999 और 2000 का सीएमआईई डाटाबेस (प्रोवैस)
28 सिंतबर, 2001 का इकॉनोमिक टाइम्स
             
 

n.l.= not listed

 

 

 

 

बिक्री का मूल अर्जन अनुपात (सीएमसी) = 12

निजीकरण के पश्चात सीएमसी की स्थिति
सेबी टेकओवर कोड के अधीन अपेक्षाओं के अनुसार सामरिक भागीदार ने बाजार से शेयर खरीदने के लिए खुली पेशकश की घोषणा की थी।इसके खुलने की तारीख 27 नवंबर, 2001 थी और बद होने की तारीख 26 दिसंबर, 2001 थी। इस खुली पेशकश की प्रक्रिया में 18,561 शेयरों अर्थात सीएमसी की 0.12% प्रदत्त पूंजी के लिए 96 आवेदन प्राप्त हुए थे।
 
बिक्री के पश्चात नई प्रबंधन ने वित्त वर्ष 2000-2001 के लिए सभी पात्र कर्मचारियों को 50% उत्पादकता संबंधी प्रोत्साहन राशि का वितरण किया था, जो पूर्व संशोधित ग्रेड में लगभग 4-6 महीने के मूल वेतन के बराबर होता है। वित्त वर्ष 2001-02 के लिए दूसरी तिमाही के वित्तीय परिणामों में भी उत्पादकता संबंधी प्रोत्साहन राशि का प्रावधान किया गया था। निजीकरण के बाद एक वर्ष के अंदर 558 नए कर्मचारियों की नियुक्ति भी की गई थी।
 
विनिवेश के बाद सीएमसी और सामरिक भागीदार घरेलू तथा अंतर्राष्ट्रीय दोनों बाजारों में अपने ग्राहकों को अपने संपूर्क उत्पादों और सेवाओं की पेशकश कर रहे हैं। शेयर मूल्य भी ऊपर चढ़ रहा है, जो एक सकारात्मक बाजार सूचक है।

हिन्दुतान जिंक लिमिटेउ
 
  
हिन्दुस्तान जिंक लि. (एचजैडएल) संबंधी प्रेस नोट
भारत सरकार ने हिन्दुस्तान जिंक लि. में 26% इक्विटी का 445 करोड़ रुपए (40.50 रुपए प्रतिशेयर) के मूल्य पर स्टरलाइट अप्चयुनिटीज वेंचर्स लि. (स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (इंडिया) लि. और स्टरलाइट ऑप्टिकल टेक्नोलॉजी लि. द्वारा समर्थित विशेष प्रयोजन कंपनी) के पक्ष में विनिवेश करने का निर्णय लिया है।

इसका मतलब है मूल्य/अर्जन (पी/ई) अनुपात लगभग 21 बनता है। वर्ष 2000 तक पिछले आठ वर्षों के दौरान कंपनी द्वारा 26% इक्विटी के लिए परिकलित प्रदत्त औसत लाभांश 3.50 करोड़ प्रतिवर्ष रहा है। अन्य कपनियों की सामरिक बिक्री के लिए पी/ई अनुपात का ब्यौरा अनुबंध में दिया गया है।

इस सौदे के लिए बीएनपी परिवास ने सलाहकार के रूप में काम किया और मैसर्स अमरचंद मंगलदास एंड ए सर्रोफ और कंपनी ने विधिक सलाहकार के रूप में कार्य किया।

एचजैडएल की स्थापना जनवरी, 1966 में तत्कालीन मेटल कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. को अधिकार में लेने के बाद एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में की गई थी। इसकी प्रदत्त पूंजी 422.53 करोड़ रुपए है, जिसमें से भारत सरकार के पास 75.92% है जबकि शेष इक्विटी वित्तीय संस्थानों, अन्य निगमित निकायों (एनआरआई सहित) और भारतीय नागरिकों के पास है। यह एक लाभ अर्जित करने वाली और सूचीबद्ध कपनी है और इसके शेयरों की खरीद फरोख्त मुंबई, दिल्ली और जयपुर के स्टॉक एक्सचेंजों में की जाती है। इसके शेयरों में विशेष कर वीएसएनएल, आईबीपी आदि के सफल विनिवेश के बाद तेजी आई। पिछले छह महीनों के दौरान शेयरों का धारित औसत मूल्य लगभग 25.30 रुपए है और पिछले छह महीनों के दौरान साप्ताहिक उच्चतम और न्यूनतम अंतिम मूल्य का औसत 22 रुपए प्रतिशेयर से अधिक है।

सामरिक बिक्री के माध्यम से 26% इक्विटी के विनिवेश का निर्णय 29.08.2000 को लिया गया था। उचित प्रक्रिया अपनाते हुए सभी अहर्ताप्राप्त इच्छुक पार्टियों से मूल्य बोलियां आमंत्रित की गई थी, जो 08.11.2001 को प्राप्त होनी थी। केवल एक अहर्ताप्राप्त इच्छुक पार्टी ने अपनी मूल्य बोली प्रस्तुत की थी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था क्योंकि यह तय किए गए आरक्षित मूल्य से कम थे।

सरकार के निर्देशों के अनुसरण में यह कार्रवाई दुबारा की गई थी, जिसमें वे मूल अहर्ताप्राप्त इच्छुक पार्टियों शामिल की गई थीं, जिन्होंने अपना उचित अध्यवसाय पूरा कर लिया था और सलाहकारों/विधिक सलाहकारों को भी शामिल किया गया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सौदा दस्तावेजों में मूल्य को कैसे कम किया जा सके और बोली की शर्तों में संशोधन किया जाए ताकि कंपनी के संभावित मूल्य को बढ़ाया जा सके जिससे बोलदाताओं का आकर्षण बढ़ सके। पर्यावरणीय, स्वास्थ्य तथा कंपनी के सुरक्षात्मक उचित अध्यवसाय की समीक्षा करने के लिए मैसर्स यूआरएस कार्पोरेशन को नियुक्त किया गया था। सौदा दस्तावेजों में किए गए संशोधनों में क्रय और विक्रय विकल्पों के क्रम और उनका मूल्य निर्धारण, 51% भागीदारी हासिल करने पर सामरिक भागीदार द्वारा अध्यक्ष नामांकित करने का प्रावधान, तीन वर्षों की अवधि के लिए असीमित पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और कंपनी से बाहर निकलने के लिए सरकार के लिए एक स्पष्ट मार्ग शामिल हैं। इसके अलावा, बिक्री मूल्य को सेबी के टेकओवर कोड के अधीन सार्वजनिक पेश्काश मूल्य से अलग कर दिया गया है। इसी दौरान 28.02.2002 को यह घोषणा की गई थी कि सीमा शुल्क 35% से कम करके 25% कर दिया जाएगा, जिससे कंपनी के लाभ पर प्रभाव पड़ने की संभावना है।

अंततः सभी पांचों अहर्ताप्राप्त इच्छुक पार्टियों (ग्लेनकोर इंटरनेशनल, बीनानी इंडस्ट्रीज, इंडो गल्फ कार्पोरेशन, स्टरलाइट और मैटडिस्ट) से मूल्य बोलियां आमंत्रित की गई थीं।

दो वित्तीय बोलियां मैसर्स इंडो गल्फ कार्पोरेशन तथा मैसर्स स्टरलाइट अर्प्च्युनिटीज एंड वैंचर्स लि. से प्राप्त हुई थी। आरक्षित मूल्य 32.15 रुपए प्रतिशेयर (26% भागीदारी के लिए 353.17 करोड़ रुपए) तय किया गया था। प्राप्त की गई दोनों मूल्य बोलियां आरक्षित मूल्य से अधिक थी। इनमें से 445 करोड़ रुपए (लगभग 40.50 रुपए प्रतिशेयर) की उच्चतर बोली, जो मैसर्स स्टरलाइट अर्प्च्युनिटीज एंड वैंचर्स लि की थी, स्वीकार कर ली गई थी। मैसर्स स्टरलाइट अर्प्च्युनिटीज एंड वैंचर्स लि द्वारा पेशकश किया गया मूल्य नवंबर, 2001 में स्टरलाइट इंडस्ट्रीज द्वारा पेशकश किए गए मूल्य से कहीं अधिक है।

यह सौदा 11.04.2002 को संपन्न हो गया था। कंपनी के कर्मचारियों और पूर्णकालिक कार्यात्मक निदेशकों को एक आकर्षक कर्मचारी स्टॉक विकल्प येाजना की पेशकश की गई थी। कर्मचारियों को 1.46% शेयर 10 रुपए प्रतिशेयर की दर पर दिसंबर, 2002 में बेचे गए थे।

सामरिक भागीदार के लिए उपलब्ध 'क्रय विकलप' के एक भाग के रूप में सरकार ने नवंबर, 2003 में और 18.92% शेयरों की 40.50 रुपए प्रतिशेयर की दर पर 323.88 करोड़ रुपए में बिक्री की थी।
  अनुबंध
मूल्य अर्जन अनुपात

शेयरधारकः करदाता

शेयरों की बिक्री बनाम सामरिक विनिवेश                       

शेयरों की बिक्री

सामरिक विनिवेश

1991-99

2000-2002

आईओसी = 4.9

बालको = 19

बीपीसीएल = 5.7

सीएमसी = 12

एचपीसीएल = 5.9

एचटीएल = 37

गेल = 4.4

एमएफआईएल = बहुत अधिक *                

वीएसएनएल = 6.0 (एकाधिकार के दिनों में)

एलजेएमसी = –वही-

 

पीपीएल = –वही-

 

जैसप = –वही-

 

आईबीपी = 63

 

वीएसएनएल = 11**

 

एचजैडएल = 21

* चूंकि प्रतिशेयर अर्जन नकारात्मक था

** लाभांश आदि से आय सहित (एकाधिकार की समाप्ति के बाद)

   एचटीएल लिमिटेड
एटीएल की पृष्ठभूमि

  • कंपनी का स्वामित्व पूर्णतः भ्रारत सरकार के पास था और इसकी स्थापना वर्ष 1960 में तत्कालीन डाक एवं तार विभाग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मुख्य तौर पर इलेक्ट्रो मेकेनिकल टेलीप्रिंटर्स के निर्माण के लिए की गई थी।
  • 90 के दशक के आरंभ से एचटीएल ने अपने उत्पादन पोर्टफोलियो में विविधिकरण किया और इलेक्ट्रो मेकेनिकल टेलीप्रिंटर्स के निर्माण से हटकर डिजिटल टेलीफोन एक्सचेंज उत्पादों, ट्रोसमिशन उत्पादों, एक्सेस उत्पादों और डाटा एवं टर्मिनल उत्पादों का निर्माण करने लगी।
  • मुख्य निर्माण सुविधा गिंडी इंस्ट्रीयल इस्टेट, चेन्नई में स्थित है और अनुपूरक सुविधा बेंगलोर शहर के नजदीक होसुर इंस्ट्रीयल इस्टेट में स्थित है।
  • कंपनी 6 क्षेत्रीय कार्यालयों और उप-कार्यालयों के बिक्री तथा वितरण नेटवर्क के माध्यम से काम करती है।
  • एचटीएल में लगभग 1100 कर्मचारी कार्यरत हैं।

ऐतिहासिक वित्तीय कार्यनिष्पादन    


सभी आंकड़े मिलियन रुपए में हैं

विवरण

मार्च 2001

मार्च 2000

मार्च 1999

मार्च 1998

कुल आय

4,553

4,559

3,647

2,873

कुल संचालन लागत

4,212

4,087

3,471

2,722

पीबीडीआईटी

341

472

176

151

कुल आय का %

7.5%

10.4%

4.8%

5.3%

मूल्यह्रास

38

36

31

27

पीबीआईटी

303

435

145

124

ब्याज

275

228

59

57

कर पूर्व लाभ

28

207

86

67

कर

8

82

17

11

करोपरांत लाभ

20

125

69

56

कुल आय का %

0.4%

2.7%

1.9%

1.9%

स्रोतः एचटीएल की वार्षिक रिपोर्ट

 

 

 

एचटीएल के कारोबार में विनिवेश
भारत में दूरसंचार उपकरण कंपनियों में सबसे अधिक राजस्व अर्जित करने वाली कंपनी होने के बावजूद एचटीएल का लाभ अर्जन बहुत कम रहा। एचटीएल की प्रमुख उत्पाद लाइन, डिजिटल टेलीफोन उत्पाद (सी-डॉट और सीमेंस की तकनीकी सहायता के साथ निर्मित) में इसे शिखर पर बनाए रखने में भारी योगदान दिया। इन उत्पादों के कारण सम्प्रेषण और एकसेस उत्पादों जैसी अन्य श्रेणियों की तुलना में लाभ कम रहा
 
वित्त वर्ष 2001 में स्विचिंग इक्यूपमेंट सेगमेंट में भारतीय तथा बहुराष्ट्रीय दूरसंचार उपकरण कंपनियों दोनों में कड़ी मूल्य प्रतिस्पर्धा देखने को मिली थी और इस स्थिति को दूरसंचार विभाग के न्यूनतम मूल्य बोली पर आदेश हासिल करने के मापदंड ने और गंभीर बना दिया।
 
कंपनी के क्रियाकलापों में कुछ मुख्य गतिरोधों में निम्नलिखित शामिल हैः

  • डिजिटल स्विचिंग इक्यूमेंट के प्रति उत्पाद मिश्रण की ओर मुड़ जाना
  • कर्मचारियों की बहुत बड़ी फौज
  • प्रौद्योगिक अनुसंधान एवं विकास पर कम खर्च
  • चलता पूंजी का बड़ा चक्कर
  • अपर्याप्त विपणन एवं वितरण नेटवर्क
  • नगण्य निर्यात बाजार

तुलनात्मक कार्यनिष्पादन

    निम्नलिखित तालिका में भारत में कुछ सार्वजनिक व्यापार किए जाने वाले दूरसंचार उपक्रमों की निर्माण कंपनियों का महत्वपूर्ण वित्तीय कार्यनिष्पादन दर्शाया गया है।

कंपनी

बाजार मूल्य

बिक्रियां   (2000-01)

करोपरांत लाभ  (2000-01)

बिक्री के % के रूप में करोपरांत लाभ

एचटीएल

उपलब्ध नहीं

4,416

20

0.5%

एचएफसीएल

2,696

12,800

1,279

10%

आईटीआई

704

21,850

-253

-1%

पंजाब कम्युनिकेशंस

406

1,471

41

3%

श्याम टेलिकॉम

932

2,083

164

8%

स्रोतः पूंजी बाजार

 

 

 

टिप्पणीः सभी आँकड़े मिलियन रुपए में, बाजार मूल्य 19 सितंबर, 2001 की स्थिति के अनुसार

विनिवेश प्रक्रिया

विनिवेश आयोग की सिफारिशें
विनिवेश आयोग ने अप्रैल, 1997 की अपनी दूसरी रिपोर्ट में एचटीएल को एक गैर-महत्वपूर्ण श्रेणी की कंपनी में वर्गीकृत किया था और अन्य बातों के साथ-साथ एचटीएल के शत-प्रतिशत या 50% शेयरों की प्रतिस्पर्धात्मक बोली के माध्यम से सामरिक बिक्री करने की सिफारिश की थी। सरकार का निर्णय मंत्रिमंडल ने 16 दिसंबर, 1998 को एचटीएल की 50% इक्विटी का किसी सामरिक भागीदार के पक्ष में विनिवेश करने का निर्णय लिया था। तदुपरांत 26 मई, 2000 को सरकार ने एचटीएल की 74% इक्विटी का विनिवेश करने का निर्णय लिया था क्योंकि पहले 50% इक्विटी के विनिेवेश के प्रस्ताव को बोलीदाताओं से बहुत धीमी प्रतिक्रिया प्राप्त हुई थी।
भारत सरकार नियुक्त विशेषज्ञ

    • वैश्विक सलाहकार
      ः केपीएमजी इंडिया प्रा.लि.
    • विधिक सलाहकारः अमचरंद एंड मंगलदास एंड सुरेश ए. सर्रोफ एंड कंपनी
    • परिसंपत्ति मूल्यांकनकर्ताः मैसर्स पी.टी.सनमुगम

    प्रतिस्पर्धात्मक बोली प्रक्रिया

    • भारत सरकार ने विनिवेश प्रक्रिया के लिए 13 सितंबर, 1999 को वैश्विक सलाहकार का चयन किया। एक अंतर्मंत्रालय दल (आईएमजी) की एक बैठक आयोजित की गई।
    • जैसाकि ऊपर उल्लेख किया गया है, भारत सरकार ने आरंभ में अपनी 51% शेयरधारिता का एक दीर्घकालिक सामरिक निवेशक को विनिवेश करने की योजना बनायी थी।
    • हालांकि इस शासनादेश को परिवर्तित कर दिया गया और 74% भागीदारी की बिक्री करने का निर्णय लिया गया क्योंकि भारत सरकार को लगा कि यह विकल्प निवेशकों के लिए अधिक अनुकूल होगा
    • वैश्विक सलाहकार को इच्छुक पार्टियों से हित की अभिव्यक्तियां प्राप्त हुईं जिनमें मोटोरोला इडिया लि., ह्वाई टेक्नोलॉजिस ऑफ चाइना के साथ वीप्रो पेरिफरियल्स, तमिलनाडु न्यूज प्रिंट्स एंड पेपर्स लि. (टीएमपीएल), एल्काटेल ट्रेड इंटरनेशनल एजी, हिमाचल फ्यूचरिस्टिक कम्युनिकेशंस लि. (एचएफसीएल) और गोकिना इंफोटेक (प्रा.) लि. शामिल थीं। टीएनपीएल ने बाद में युनाइटेड टेलीकॉम से नाता जोड़ लिया।
    • उपरोक्त पार्टियों में से मोटोरोला और एल्काटेल ने दूरसंचार उपकरण बाजार संबंधी अपनी अवधारणा के कारण अपना नाम वापस ले लिया। एचएफसीएल और टीएनपीएल और युनाइटेड टेलीकॉम के संघ को चेन्नई में डाटाकक्ष का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया गया था।
    • डाटाकक्ष के दौरे के बाद वीप्रो ने भी अपना नाम वापस ले लिया और अपना नाम वापस लेने के पीछे एचटीएल में अनुसंधान एवं विकास सुविधाओं की कमी को अपना मापदंड बताया।
    • मसौदा शेयरधारक करार और शेयर खरीद करार टीएनपीएल और यूटीएल और एचएफसीएल को जारी किए गए थे तथा बंधनकारी बोलियां आमंत्रित की गई थीं।
    • भारत सरकार ने इन संभावित उम्मीदवारों से 27 सिंतबर, 2001 को बोलियां प्राप्त की थीं।

    मूल्यांकन

    • केपीएमजी ने 27 सितंबर, 2001 को मूल्यांकन रिपोर्ट भारत सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया।
    • विभिन्न मूल्य निर्धारण पद्धतियों के आधार पर एचटीएल की शत-प्रतिशत इक्विटी के लिए संकेतात्मक मूल्य दायरे का सारांश नीचे दिया गया हैः

    मूल्य निर्धारण पद्धति

    आधार

    मूल्य (मिलियन रु.)

    डिस्काउंटेड कैश फ्लो पद्धति

    प्रबंधन की रणनीतिक कारोबारी योजना और सरकार द्वारा अनुमोदित मूल्य निर्धारक द्वारा यथा-निर्धारित अतिरिक्त परिसंपत्तियों के मूल्य के आधार पर 31 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार एक चालू कंपनी का मूल्य निर्णारण

    524.36

    परिसंपत्ति मूल्यांकन पद्धति

    31 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार मूल्य

    527.92

    तुलन-पत्र पद्धति

    31 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार निवल मूल्य

    574.73

    तुलनीय कंपनी पद्धति

    भारत में दूरसंचार उपकरण कंपनियों का बाजार तुलनीय स्टॉक

    403.17

     

    • यह विचार किया गया था कि डीसीएफ पद्धति के अनुसार मूल्य, उस मूल्य का अधिकतम उपयुक्त संकेत होगा, जिसका भुगतान करने के लिए संभावित सामरिक खरीददार इच्छुक होगा, वो भी उस स्थिति में जब इस सौदे को सामरिक बिक्री के तौर पर संपन्न किया जा रहा हो।
    • अतः मूल्यांकन समिति ने सिफारिश की थी कि एचटीएल की 74% इक्विटी का आरक्षित मूल्य 388.02 मिलियन होना चाहिए।


    परिणाम

    • एक अग्रणी भारतीय दूरसंचार उपकरण निर्माता हिमाचल फ्यूचरिस्टिक कम्युकेशंस ने 74% इक्विटी 550 मिलियन रुपए में हासिल की। इसका अभिप्राय है कि शत-प्रतिशत इक्विटी का मूल्य 743 मिलियन रुपए है।
    • मूल्य अर्जन अनुपात पंजाब कम्युनिकेशन के लगभग 10 और श्याम टेलीकॉम 5.6 के मूल्य अर्जन अनुपात की तुलना में 37 परिकलित होता है।
    • इस क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा और एचटीएल के घटते लाभ की स्थिति में इस चरण पर सामरिक भागीदार को शामिल करने से कंपनी को प्रगति करने में सहायता मिलनी चाहिए।
    • यदि 550 मिलियन रुपए की यह राशि सरकार द्वारा सावधि जमा में निवेश कर दिया जाए तो इससे 55 मिलियन की वार्षिक आय होगी (ब्याज की दर 10% प्रतिवर्ष मानकर)।
    • इस आय की तुलना में 74% इक्विटी पर सरकार को जो वार्षिक लाभांश प्राप्त हुआ, इसका ब्यौरा इस प्रकार हैः

    वर्ष

    राशि (मिलियन रुपए में)

    1997 – 1998

    1.11

    1998 – 1999

    3.33

    1999 – 2000

    6.66

    2000 – 2001

    6.66

         स्रोतः एचटीएल की वार्षिक रिपोर्टें Annual Reports श्रमिकों के संरक्षण संबंधी उपाय

    • कर्मचारियों के सरंक्षण के संबंध में शेयरधारक करार में पर्याप्त प्रावधान किए गए हैं, दोनों पार्टियाँ इस बात को दृष्टिगत करती हैं कि कंपनी के सभी कर्मचारी इस तारीख के बाद कंपनी के रोजगार में बने रहेंगे और अनुसूचित जाति/जनजाति, शारीरिक विकलांग श्रेणी के सदस्य और समाज की अन्य सामाजिक रूप से उपेक्षित श्रेणियों के व्यक्तियों के लाभ के सिद्धांतों को मान्यता देती है।
    • शेयरधारक करार में यह व्यवस्था की गई है सामरिक भागीदार एक वर्ष की अवधि तक किसी प्रकार की पदच्युति अथवा लागू कर्मचारी विनियमन तथा कंपनी के स्थायी आदेशों अथवा लागू कानून के अनुसरण में अपने रोजगार से कर्मचारियों की सेवा समाप्ति को छोड़कर, कंपनी के किन्हीं कर्मचारियों की छंटनी नहीं करेगा; कंपनी के श्रम बल की किसी भी प्रकार की पुनर्संरचना, बोर्ड द्वारा की गई संस्तुति के तरीके तथा सभी लागू कानूनों के अनुसरण में क्रियान्वित की जाएगी; कंपनी के कर्मचारियों की संख्या में किसी प्रकार की कटौती करने की दशा में, सामरिक भागीदार यह सुनिश्चित करेगा कि कंपनी अपने कर्मचारियों को उन शर्तों पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के विकल्प की पेशकश करे जो किसी भी तरह से अंतिम तारीख को लागू स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के कम अनुकूल न हों।
    • 16 अक्तूबर, 2001 को संचार भवन, नई दिल्ली में आयोजित सुपुदर्गी समारोह में एचटीएल के नए प्रबंधन ने घोषणा की थी कि कर्मचारियों की छंटनी की कोई योजना नहीं है।
    • वास्तव में, नए प्रबंधन ने इस अवसर पर एचटीएल के कर्मचारियों को दो वेतन वृद्धियां प्रदान करने की घोषणा भी की थी, जिनका उन्हें विनिवेश से पहले आश्वासन दिया गया था, परंतु यह निर्णय तब तक क्रियान्वित नहीं किया था।

       इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कार्पोरेशन लिमिटेड (आईपीसीएल)

    31 मार्च 2000 की स्थिति के अनुसार

    प्रदत्त पूंजी

    249.05 करोड़ रुपए

    भारत सरकार की शेयरधारिता

    148.80 करोड़ रुपए (59.75%)

    निवल मूल्य

    Rs. 2,961.02

    निवल लाभ/घाटा

    Rs. 188.84

    Major activity

    Production of chemicals and petrochemicals with focus on polymers

    मुख्य गतिविधि

    पॉलिमर्स पर जोर देते हुए केमिकल्स और पेट्रोकेमिकल्स का उत्पादन

    कार्यशाला की अवस्थिति

    नागाथौंन (महाराष्ट्र), गंधार और बड़ोदरा (गुजरात)

    विनिवेश आयोग की सिफारिशें (मार्च, 1998)

    वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक बोली प्रक्रिया के माध्यम से प्रबंधन नियंत्रण के हस्तांतरण के साथ-साथ सामरिक क्रेता को 25% इक्विटी की पेशकश करना और यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानी बरतना कि सामरिक बिक्री के परिणामस्वरूप बाजार में किसी एक मात्र भागीदार का एकाधिकार न हो जाए।

    सरकारी निर्णय के कार्यान्वयन की वर्तमान स्थिति

    बारबर्ग डिलन रिड (डब्ल्यूडीआर) को सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया है। सामरिक भागीदार अर्थात रिलायंस ग्रुप के पक्ष में 26% सरकारी इक्विटी की 1490 करोड़ रुपए में बिक्री के विनिवेश सौदे का अनुमोदन कर दिया गया है।

    www.ipcl.co.in

    हित की अभिव्यक्ति

    आईपीसीएल में विनिवेश

  1. भारत सरकार ने 17 मई, 2001 को अग्रणी पेट्रोकेमिकल सरकारी क्षेत्र के उपक्रम आईपीसीएल में 26% इक्विटी शेयरों की 1491 करोड़ रुपए के मूल्य पर बिक्री के माध्यम से रिलायंस पेट्रो इन्वेस्टमेंट्स लि. (रिलायंस ग्रुप) को सामरिक भागीदार के रूप में सम्मिलित करने का अनुमोदन किया।

आरक्षित मूल्य

  1. सलाहकार (यूबीएस बारबर्ग) ने अपनी रिपोर्ट में आईपीसीएल के शेयरों के मूल्यांकन की गणना चार पद्धतियों नामतः डिस्काउंटेड कैश फ्लो, समायोजित तुलन पत्र, तुलनीय कपनियां और समायोजित परिसंपत्ति मूल्यांकन पद्धतियों को अपनाते हुए की थी। मूल्यांकन समिति ने सलाहकार द्वारा किए गए आईपीसीएल के मूल्यांकन पर विचार किया और आरक्षित मूल्य की सिफारिश की।

आरक्षित मूल्य

26% इक्विटी का आरक्षित मूल्य (करोड़ रुपए में)

100% इक्विटी का लगभग समकक्ष मूल्य (करोड़ रुपए में)

प्रतिशेयर लगभग मूल्य (रुपए में)

845   

3252   

131   

मूल्यांकन समिति द्वारा अनुशंसित आरक्षित मूल्य डिस्कांउटेंड कैश फ्लो पद्धति पर आधारित था क्योंकि यह किसी चालू कंपनी के लिए अधिकतम उपयुक्त मूल्यांकन पद्धति है।  
प्राप्त बोलियां

  1. तीन बोलीदाताओं द्वारा प्रस्तुत बोलियों का सारांश नीचे दिया गया है

बोलीदाता

26% इक्विटी का बोली मूल्य (करोड़ रुपए में)

100% इक्विटी का लगभग समकक्ष मूल्य (करोड़ रुपए में)

प्रतिशेयर लगभग मूल्य (रुपए में)

रिलायंस पेट्रो इंवेस्टमेंट्स लि.

1,491

5,735

231

इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लि

826

3,177

128

निरमा केमिकल वर्क्स लि.

711

2,735

110

  1. रिलायंस पेट्रो इंवेस्टमेंट्स लि. की 1491 करोड़ रुपए की उच्चतम बोली का अर्थ है वर्ष 2001-02 के लिए 4 रुपए के प्रतिशेयर अर्जन पर आधारित 58 का मूल्य/अर्जन अनुपात जोकि रिलायंस इंडस्ट्रीज लि. (10.5) और गेल (5.36) जैसी समकक्ष समूह कंपनियों के मूल्य/अर्जन गुणनफल से कहीं अधिक है।
     
  2. पिछले पांच वर्षों के लिए करोपरांत लाभ, घोषित लाभांश की दर और 26% इक्विटी पर भारत सरकार के हिस्से के आंकड़े नीचे दिए गए हैं।

वर्ष

करोपरांत लाभ
(करोड़ रुपए में)

26% सरकारी इक्विटी शेयरों पर लाभांश
(करोड़ रुपए में)

1996-1997

510

25.8

1997-1998

244

25.8

1998-1999

29

6.5

1999-2000

189

12.9

2000-2001

249

19.4

सामरिक भागीदार को 26% इक्विटी के हस्तांतरण से प्राप्त बिक्री राशि पर 10% की दर से आय को ध्यान में रखते हुए आईपीसीएल से लाभांश के रूप में भारत सरकार को प्राप्त औसतन लगभग 18 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की तुलना में 149 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष की आय होगी।.
पृष्ठभूमि

  1. भारत की एक अग्रणी पेट्रोकेमिकल उत्पादक कंपनी आईपीसीएल को गैर-महत्वपूर्ण क्षेत्र में संचालित कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कंपनी की कुल प्रदत्त इक्विटी 248.22 करोड़ रुपए है जिसमें से 148.80 करोड़ रुपए के शयेर सरकार के पास धारित हैं। सामरिक भागीदार को बेची गई इक्विटी का अकित मूल्य 64.54 करोड़ रुपए (26.6%) होगा। सरकार ने 16 दिसंबर, 1998 को सिद्धांत रूप से आईपीसीएल में सामरिक बिक्री के माध्यम से विनिवेश करने का निर्णय लिया था। सरकार ने प्रेस विज्ञापन के माध्यम से इच्छुक निवेशकों से हित की अभिव्यक्तियां आमंत्रित की थीं।
     
  2. इसी दौरान नवंबर, 2000 में आईओसी और आईपीसीएल के कार्यकलापों और हितों की एकरूपता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने आईपीसीएल के बड़ोदरा स्थित परिसर को आईओसी को हस्तांतरित करने और उसके बाद शेष आईपीसीएल के संबंध में संसाधित 25% इक्विटी के विनिवेश की संभावना का भी पता लगाया। अंततः सरकार ने 12 नवबंर, 2001 को इस राह पर आगे न चलने का निर्णय लिया और उसकी बजाय समूचे आईपीसीएल के लिए सामरिक बिक्री का प्रयास जारी रखने का निर्णय लिया। यह निर्णय लिया गया कि सामरिक बिक्री के लिए पेशकश की गई इक्विटी को पहले प्रस्तावित 25% की बजाय 26% तक इस वचनबद्धता के साथ बढ़ाया जाना चाहिए कि आगे भी कम से कम 25% इक्विटी का विनिवेश किया जाए।
     
  3. इस सौदे में मैसर्स यूबीएस बारबर्ग द्वारा सरकार की सहायता की गई। पाठक एंड एसोसिएट्स विधिक सलाहकार थे और मैसर्से डिलाइट हैस्किंग्स एंड सेल्स परिसंपत्ति मूल्य निर्धारक थे।
     
  4. इच्छुक निवेशकों ने हित की अभिव्यक्तियां दिसंबर, 2001 में प्रस्तुत कीं। संक्षिप्त सूचीबद्ध पार्टियों ने उचित अध्यवसाय पूरा किया और बोलीदाताओं के साथ चर्चाओं के अनेक दौरों के बाद सौदा दस्तावेजों पर सहमति बनी। उसके बाद इन दस्तावेजों के आधार पर बोलीदाताओं से वित्तीय बोलियां 29 अप्रैल, 2002 को प्राप्त हुई थीं।

अन्तिम बार 21 अगस्त, 2002 को अद्यतित 

  जैसप एंड कंपनी लिमिटेड (जेसीएल) जैसप एंड कपनी लि. को 1973 में राष्ट्रीयकृत किया गया था, जोकि एक घाटे वाली कंपनी थी। कुछ वर्षों तक तो इसने लाभ कमाया लेकिन बाद में यह राष्ट्रीयकृत कंपनी घाटे वाली कपनी बनी रही। कंपनी का पिछले कुछ वर्षों का निष्पादन नीचे दिया गया है।

वर्ष

कर पश्चात लाभ (रुपए करोड़ में)

1998-1999

0.70*

1999-2000

(-) 43.92

2000-2001

(-) 48.77

2001-2002 (सितंबर, 2001 तक)

(-) 21.19

31 मार्च, 2001 और 30 सिंतबर, 2001 के अनुसार कंपनी का संचित घाटा और निवल मूल्य (करोड़ रुपए में) नीचे दिया गया है।

तारीख को

निवल मूल्य

संचित घाटा

31 मार्च, 2001

(-) 270.57

351.18

30 सिंतबर, 2001

(-) 290.38

372.37

सरकार ने 1986 से पुनरूद्धार के जरिए कंपनी को पुनर्जीवित करने के लिए बहुत से प्रयास किए हैं। विगत में भारत सरकार द्वारा दी गई सहायता एवं रियायतों का ब्यौरा नीचे दिया गया है।

(ये सभी आंकड़े करोड़ रुपए में हैं)

वित्तीय पुनरूद्धार का वर्ष

पुनरूद्धार पर आधारित निधि

निधि रहित आधारित पुनरूद्धार

कुल

1986

-

52.39

52.39

1997

54.00

241.55

295.55

1997-98 to 2001-02 (जनवरी, 2002)

118.06

-

118.06

कुल

172.06

293.94

466.00

बहुत बड़े पैमाने पर निधियां जुटाने और वित्तीय पुनर्गठन करने के बावजूद भी कंपनी पुनर्जीवित नहीं हो सकी।
चूंकि जेसीएल एक रूग्न कंपनी है और बीआईएफआर को संदर्भित है। इसलिए बीआईएफआर ने भी कंपनी को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए हैं लेकिन अंत्तोगत्वा अगस्त, 2000 में घोषित कर दिया कि चूंकि पुनरूद्धार योजना विफल हो चुकी है और ऑपरेटिंग एजेंसी से पूछा गया कि प्रबंधन परिवर्तन करने की संभावनाओं का पता लगाया जाए।
ऑपरेटिंग ऐजेंसी ने सितंबर, 2000 में विज्ञापन जारी किया। वह निष्फल गया और कंपनी के पुनरूद्धार के लिए कोई प्रस्ताव सामने नहीं आया।
इसलिए कंपनी के पुनरूद्धार के लिए अतिम प्रयास के रूप में सरकार ने लगभग 203.82 करोड़ रुपए में जेसीएल के विनिेवेश की प्रक्रिया आरंभ कर दी। लेकिन सलाहकार (मैसर्स ए.एफ.फर्गुसन एंड कपनी) द्वारा कम्प्युटेशन के अनुसार 31 मार्च, 2002 की तिथि के अनुसार, यहां तक कि सरकार द्वारा वित्तीय पुनर्गठन करने के बाद कंपनी का निवल मूल्य लगभग (-) 17.87 करोड़ रुपए होगा।
सरकार ने जेसीएल में 72% इक्विटी की शेयरधारिता के लिए दो वित्तीय बोलियां प्राप्त की। 72% इक्विटी शेयरों के लिए मैसर्स रूइया कोटेक्स लि. की बोली 18.18 करोड़ रुपए की राशि की थी जोकि 12 करोड़ रुपए के आरक्षित मूल्य से अधिक थी। सरकार ने 27 फरवरी, 2002 को 18.18 करोड़ रुपए के लिए जेसीएल की इक्विटी में 72% की प्राप्ति के लिए मैसर्स रूइया कोटेक्स लि. की वित्तीय बोली को स्वीकार करने का निर्णय ले लिया।
चूंकि जैसफ एंड कपनी, बीआईएफआर के अधिकार क्षेत्र में थी इसलिए बीआईएफआर से सामरिक भागीदार की भागीदारी के प्रस्ताव को अनुमोदित करने के लिए इसकी मंजूरी लेने के लिए अनुरोध किया गया। सितंबर, 2002 में बीआईएफआर ने सरकार द्वारा चयनित सामरिक भागीदार को शामिल करने के जरिए पुनरूद्धार की योजना को अनुमोदित कर दिया। हालांकि जैसफ एंड कपनी लि. के स्टाफ संघ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर दी जिसमें न्यायालय ने 15 नबंबर, 2002 को अपने आदेश को आरक्षित रख लिया और 28 मार्च, 2003 को आदेश सुना दिया।

लगन जूट मशीनरी कंपनी लि.(एलजेएमसी) का मामला सरकार द्वारा किए गए किसी केन्द्रीय सरकारी क्षेत्र के उपक्रम के सफल निजीकरण का पहला मामला था। एलजेएमसी कोलकाता स्थित एक कंपनी है और जूट मशीनरी (मुख्यतः स्पिनिंग और ड्राइंग फ्रेम्स) का निर्माण करती है। निजीकरण से पहले इसमें लगभग 400 कर्मचारी कार्यरत थे। वर्ष 1996-97 के बाद यह घाटे में चलने वाली और इसका कारोबार घटता गया। मार्च, 1998 की स्थिति के अनुसार एलजेएमसी का निवल मूल्य लगभग पांच करोड़ रुपए था और उस समय इसका वार्षिक कारोबार भी लगभग पांच करोड़ रुपए था।

एलजेएमसी के पास अपने कारोबार में वृद्धि करने और लाभ अर्जित करने की क्षमता थी। यह उन मशीनों की मुख्य आपूर्तिकर्ता कपनी थी, जिनका यह निर्माण करती थी। कंपनी अपने उत्पादों की गुणवत्ता के लिए जानी जाती थी। कल-पुर्जों के बाजार और निर्यात में विस्तार करने की संभावना थी। संयंत्र और मशीनरी के आधुनिकीकरण और उन्नयन के लिए मामूली (भारी-भरकम नहीं) निवेश की आवश्यकता थी। कर्मचारियों की आयु अधिक थी लेकिन अतिरिक्त कर्मचारियों की संख्या अधिक नहीं थी।
विनिवेश के आरंभिक चरण में वर्ष 1997 में सामरिक भागीदार के पक्ष में 74% भागीदारी की बिक्री के माध्यम से निजीकरण के लिए एलजेएमसी को अनुमोदित किया गया था। विनिवेश प्रक्रिया का संचालन भारी उद्योग विभाग (डीएचआई), उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार के निर्देशों और उसके प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन एलजेएमसी की धारक कंपनी भारत भारी उद्योग निगम लि. (बीबीयूएनएल) द्वारा किया गया था।
 विनिवेश प्रक्रिया
समग्र विनिवेश प्रक्रिया में उद्देश्य और पारदर्शित मुख्य अपेक्षाएं थीं। चूंकि भारत सरकार के लिए यह विनिवेश का पहला मामला था इसलिए विनिवेश प्रक्रिया भी वैसे ही विकसित हुई जैसे-जैसे इस सौदे में प्रगति हुई।
संभावित भागीदारों से बोलियां आमंत्रित करने के लिए विज्ञापन जारी करने के बाद विनिवेश प्रक्रिया को संपन्न करने में लगभग 10 महीने का समय लग गया।
सलाहकारों ने कंपनी की समीक्षा की और विनिवेश की सीमा पद्धति से संबंधित सलाह दी। उन मुद्दों की पहचान की गई जिनमें प्रबंधन द्वारा कार्रवाई/भारत सरकार का अनुमोदन अपेक्षित था और यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए गए कि प्रक्रिया सुचारू रूप से आगे बढ़े और शेयरधारक मूल्य अधिकतम हो।
मंत्रिमंडल ने अपना अनुमोदन दे दिया और दिसंबर, 1999 में सामरिक भागीदार के साथ आवश्यक करार संपन्न किया गया था। शेयरों के पूरे भुगतान और शेयर हस्तांतरण करार निष्पादित करने के बाद जुलाई, 2000 में कंपनी का प्रबंधन सामरिक भागीदार के सुपुर्द कर दिया गया। निजीकरण के पश्चात एलजेएमसी की स्थिति

  • सामरिक भागीदार ने पुराने वरिष्ठ प्रबंधन दल को रखा और कर्मचारियों की कोई छंटनी नहीं की। उद्योग संबंधी एक विशेषज्ञ को एलजेएमसी के प्रबंध निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया है। प्रबंधन में परिवर्तन के बाद कंपनी के संचालन और वित्तीय कार्यनिष्पादन में सुधार हुआ है।
  • प्रबंधन द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार निजीकरण से पूर्व की अवधि (अप्रैल-जून, 2000) की तुलना में एलजेएमसी के निजीकरण के पश्चात (जुलाई-सितंबर, 2000) के कार्य निष्पादन का ब्यौरा नीचे दिया गया है।

विवरण

निजीकरण से पूर्व की अवधि (अप्रैल-जून, 2000) (मिलियन रु. में) 

निजीकरण के पश्चात की अवधि (जुलाई-सितंबर, 2000) (मिलियन रु. में) 

सकल कारोबार

6

24

लाभ/घाटा

घाटा उठाया

लाभ दर्शाया

प्राप्त आदेश

12

15

कल-पुर्जों का निर्यात

0.5

1.6

 

  • नए प्रबंधन ने यह जानकारी दी है कि उन्होंने कंपनी के कार्यनिष्पादन में सुधार करने के लिए नए उत्पाद शामिल करने और विपणन प्रणाली (जो पहले कमजोर थी) और अन्य क्षेत्रों में सुधार की पहल की है।
  • एलजेएमसी, निजीकरण के बाद बिना किसी आमूलचूल परिवर्तन और निजीकरण के संबंध में बिना किसी सामान्य आशंका के पुनरूद्धार के पथ पर अग्रसर है।

   मारुति उद्योग लिमिटेड

  • सरकार ने, एक द्वि-चरणीय प्रक्रिया के माध्यम से मारुति उद्योग लिमिटेड में विनिवेश का अनुमोदन 14 मई, 2002 को प्रदान किया :-
  • पहले चरण में, सरकार द्वारा अपने राइटस शेयरों का परित्याग सुजुकी के पक्ष में कर देने के साथ मारुति उद्योग लिमिटेड द्वारा 400 करोड़ रुपए का एक राइटस इश्यु। सुजुकी अधिकांश शेयरों पर अपना नियंत्रण प्राप्त कर लेगी और वह सरकार को नियंत्रण प्रीमियम के रूप में 1000 करोड़ रुपए का भुगतान करेगी ।
  • दूसरे चरण में सार्वजनिक निर्गम के माध्यम से अपने मौजूदा शेयरों की बिक्री; यह इश्यु सुजुकी द्वारा खरीदा जाना है ।

सहमत करार के मुख्य अंश

  • भारत सरकार और सुजुकी के वार्ताकार दलों के बीच सहमत करार के मुख्य अंशों का सारांश नीचे दिया गया है :-
  • राइटस इश्यु का कुल मूल्य 400 करोड़ रुपए होगा।
  • राइटस इश्यु मूल्य 3280 रुपए प्रति शेयर होगा। इस प्रकार राइटस इश्यु प्रत्येक 100 रुपए के कुल 12,19,512 शेयरों के लिए होगा।
  • परित्याग प्रीमियम की गणना करने के प्रयोजन के लिए उचित मूल्य, इस प्रयोजन के लिए नियुक्त 3 सलाहकारों द्वारा किए गए परिकलन के अनुसार तीन मूल्यों का औसत अर्थात 3280 रुपए प्रति शेयर होगा।
  • भारत सरकार 6,06,585 शेयरों के अपने सभी राइटस शेयरों को छोड़ देगी और सुजुकी भारत सरकार द्वारा इस प्रकार परित्यक्त सभी राइटस शेयरों का उचित बाजार मूल्य पर पूर्व क्रय करेगी।
  • सुजुकी इस पद्धति और नीचे वर्णित पद्धतियों के माध्यम से मारुति उद्योग लिमिटेड के मूल्य में वृद्धि करेगी और सुजुकी भारत सरकार द्वारा मारुति उद्योग लिमिटेड में अपने शेयरों में से एक में भी कोई हिस्सेदारी किए बिना भारत सरकार को 1000 करोड़ रुपए के नियंत्रण प्रीमियम का भुगतान करेगी।
  • सुजुकी और भारत सरकार एक संशोधित संयुक्त उद्यम करार सम्पन्न करने के लिए सहमत हुए हैं। संशोधित संयुक्त उद्यम करार, भारत सरकार, सुजुकी और मारुति उद्योग लिमिटेड के बीच समस्त करार का संघटन बनेगा और ऐसे वाय वस्तु के संबंध में पार्टियों के बीच हुए कोई भी पूर्व समझौते तथा करार का अतिक्रमण हो जाएगा।
  • मारुति उद्योग लिमिटेड की संस्थागत अन्तर्नियमावली में ऊपर अभिलिखित निर्णयों के साथ उनको अनुकूल बनाने और मारुति उद्योग लिमिटेड के शेयरों का स्टॉक एक्सचेंज में सूचीकरण करने के लिए भी उपयुक्त संशोधन किए जाएंगे।
  • संशोधित संयुक्त उद्यम करार में यह व्यवस्था की गई है कि भारत सरकार, राइटस इश्यु के सौदे के पूरा हो जाने के बाद कानून द्वारा यथानुमत्य भारतीय और सार्वभौमिक निवेशकों की भागीदारी के साथ अपने मौजूदा शेयरों को घरेलू बाजार में बेच देगी।
  • सुजुकी, भारत सरकार द्वारा धारित अनुमानित 36 लाख शेयरों के पहले सार्वजनिक इश्यु को 2300 रुपए प्रति शेयर की दर पर खरीदने के लिए सहमत हुई है। शा शेयरों के लिए भारत सरकार के पास, 15 प्रतिशत की छूट पर और/अथवा औसत बाजार मूल्य के 10 प्रतिशत पर “विक्रय” विकल्प उपलब्ध है। भारत सरकार के पास इस समय के (2000 रुपए) अथवा उस समय के अंकित मूल्य पर, जो भी अधिक हो, 30 अप्रैल, 2004 तक सदा एक “विक्रय” विकल्प उपलब्ध है।
  • चूंकि राइटस इश्यु का आकार 12,19, 512 शेयरों का होगा, इसलिए राइटस इश्यु के पूरा हो जाने के बाद सुजुकी और भारत सरकार की तुलनात्मक शेयरधारिता क्रमशः 54.20 प्रतिशत और 45.54 प्रतिशत होगी
  • अब जो प्रतिशेयर मूल्य उभर कर आया है वह है 3684 रुपए जिसकी तुलना उस प्रतिशेयर मूल्य से की जानी चाहिए जो मूल्य तब आएगा यदि सुजुकी और भारत सरकार के बीच वर्ष 1992 के करार में सहमत सूत्र का उपयोग किया जाए। उस सूत्र का उपयोग करते हुए परिकलित प्रतिशेयर मूल्य 1153 रुपए होता है, जो अंतिम वर्ष अर्थात 2001-02 के अनंतिम आंकड़ों पर आधारित है।

गतिरोधों में उपलब्धि

  • पहले के करार के कारण भारत सरकार की वार्ता संबंधी स्थिति निम्नलिखित गतिरोधों के कारण अत्यधिक अलाभकारी रही है।
  • मौजूदा करार में यह खंड कि भारत सरकार को अपने हिस्से के हस्तांतरण के लिए सुजुकी की सहमति की आवश्यकता है।
  • वर्ष 1982 और 1992 में सुजुकी के साथ पहले के सौदे जब सुजुकी की शेयरधारिता (भारत सरकार की तुलना में) को बढ़ाकर 26 से 40% और फिर 40 से बढ़ाकर 50% करने की अनुमति दी गई थी, सुजुकी द्वारा कोई नियंत्रण प्रीमियम अदा नहीं किया गया था हालांकि नियंत्रण उनको सौंप दिया गया था। वास्तव में, उस चरण पर सरकार को कोई भुगतान प्राप्त नहीं हुआ था। चूंकि एमयूएल को नए शेयर जारी करके शेयरधारिता को बढ़ाने की अनुमति दी गई थी। बाहर निकलने के विकल्प भी शामिल नहीं किए गए थे।
  • 1992 के मूल्य निर्धारण सूत्र के कारण भी प्रतिशेयर 259 रुपए का न्यून मूल्य प्राप्त हुआ था जिस पर सौदा किया गया था।
  • अब 1992 में उसी सूत्र का उपयोग करते हुए प्रतिशेयर मूल्य 1153 रुपए होगा, जैसाकि ऊपर उल्लेख किया गया है। इसके विरूद्ध वर्तमान सौदा 2300 रुपए की वचनबद्धता मानते हुए न्यूनतम 3684 रुपए पर होगा।
  • यदि हम अकेले राइट्स इश्यू का निरीक्षण करें, नए शेयरों का सुजुकी को अंतिम सौदे में 269 रुपए (समकक्ष मूल्य 1153 रुपए) की तुलना में 3280 रुपए पर आबंटित किए जा रहे हैं। पिछली बार 'शून्य' नियंत्रण प्रीमियम की तुलना में भी भारत सरकार को नियंत्रण प्रीमियम के रूप में 1000 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा रहा है।
  • कंपनी में पहले ही सुजुकी का 50% नियंत्रण है और भारत सरकार 49.74% पर अल्पांश स्थिति में है।
  • पिछले मनमानी मामले के कारण दोनों पक्षों के बीच अविश्वास के एक वातावरण पर 1997 के दौरान दोनों पक्षों के बीच लड़ाई चल रही है।
  • आरंभ में सुजुकी ने नियंत्रण प्रीमियम के रूप में 170 करोड़ रुपए की पेशकश की थी, जिसे लंबी बातचीत के बाद बढा़कर 286 करोड़ रुपए कर दिया गया था। उसके बाद, वार्ताकार दल को एक महीने से भी अधिक समय लग गया जिससे राशि एक हजार करोड़ रुपए की गई, जिसकी मारूति ने अभी पेशकश की है।
  • इसी प्रकार, आरंभ में सुजुकी भारत सरकार द्वारा शेयरों के सार्वजनिक निर्गम को खरीदने की प्रतिबद्धता को शामिल करने के लिए बिलकुल भी राजी नहीं थी। अब सुजुकी 36,12,169 मौजूदा शेयरों के सार्वजनिक निर्गम को 2300 रुपए प्रतिशेयर और शेष 29,68,012 शेयरों को न्यूनतम लगभग 2000 प्रतिशेयर के मौजूदा अंकित मूल्य पर खरीदने को तैयार हो गई है। एक बार एमयूएल सूचीबद्ध हो जाए और जब भारत सरकार सुजुकी के पूरे समर्थन के साथ सार्वजनिक निर्गम करे तो शेयरों का मूल्य अंकित मूल्य से अधिक होने की संभावना है। इसका मतलब है कि भारत सरकार को अधिक धनराशि प्राप्त होगी।

सौदे का विश्लेषण

  • अब तक पूरे किए गए वी एस एन एल, बाल्को, एच जैड एल, सी एम सी आदि जैसे अन्य अनुकूल बिक्री के सौदों की तुलना में मारुति उद्योग लिमिटेड के विनिवेश की प्रकृति एकदम भिन्न है। अतः इस सौदे को, नीचे की गई चर्चा के अनुसार अलग-अलग पद्धतियों का उपयोग करते हुए समझना होगा।
     
  • विनिवेश के अन्य मामलों के साथ तुलना; चूंकि मारुति उद्योग लिमिटेड एक सूचीबद्ध कम्पनी नहीं है, अतः दोनों पक्ष, तीन स्वतंत्र मूल्य निर्धारकों द्वारा किए गए मूल्य निर्धारण के माध्यम से मारुति उद्योग लिमिटेड के शेयरों का उचित मूल्य तय करने के लिए सहमत हुए थे। यह औसत मूल्य 3280 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से निकाला गया था। अतः इस उचित मूल्य के आधार पर सरकार के मौजूदा 6580181 शेयरों का मूल्य 2158 करोड़ रुपए निकाला गया। सरकार सुजुकी से इस समय जो कुछ प्राप्त कर रही है वह नियंत्रण प्रीमियम के रूप में 1000 करोड़ रुपए है और 36 लाख शेयरों के लिए 2300 रुपए प्रति शेयर तथा लगभग 29 लाख शेयरों के लिए 2000 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से लेने पर विचार करते हुए मौजूदा शेयरों के लिए यह 1424 करोड़ रुपए की एक अतिरिक्त धनराशि होगी। यदि मौजूदा शेयरों को वर्तमान अंकित मूल्य से अधिक में बेचा जा सकता हो तो भारत सरकार की प्राप्तियां और भी अधिक हो जाएंगी। इस प्रकार, भारत सरकार को इस सौदे में से नियंत्रण की सुपुर्दगी और मौजूदा शेयरों को बेचकर न्यूनतम 2,424 करोड़ रुपए प्राप्त होंगे जो ऊपर उल्लेख किए गए 2,158 करोड़ रुपए के उचित मूल्य से 266 करोड़ रुपए अधिक हैं। यदि हम पहले के सौदों के इसी प्रकार के आंकड़ों के साथ तुलना करें तो यह पाया जाएगा कि वर्तमान सौदा उन सौदों से कहीं बेहतर है जो उनमें संभव होते।

     

  • मारुति उद्योग लिमिटेड में सुजुकी के पास 50 प्रतिशत शेयर पहले से ही हैं और नियंत्रण एवं प्रबंधन अधिकार पहले के करारों के अनुसार बराबर से अधिक थे। यह उनके प्रौद्योगिकी आपूर्तिकर्ता होने के कारण था। विनिवेश के अन्य मामलों में भारत सरकार के शेयरों को अर्जित करने से पूर्व अनुकूल साझीदार के पास कोई नियंत्रण नहीं रहता अपितु वह अनुकूल बिक्री के बाद ही नियंत्रण का अधिकार प्राप्त करता है। इस प्रकार, सुजुकी द्वारा इस समय की गई नियंत्रण प्रीमियम की पेशकश को इसी पृठभूमि में देखा जाना चाहिए।
     
  • सरकार को नकद वार्षिक आमदनी: इस समय सरकार अपनी शेयरधारिता पर लाभांश प्राप्त करती है। विगत कई र्वों में सरकार को प्राप्त लाभांश लगभग 13-20 करोड़ रुपए प्रति वर्ष रहा है। वर्ष 2000-01 में मारुति उद्योग लिमिटेड ने किसी लाभांश की घाणा नहीं की । यदि यह सौदा पूरा हो जाता है तो सरकार को 1000 करोड़ रुपए पहले ही प्राप्त हो जाएंगे जिस पर 10 प्रतिशत की सन्तुलित दर पर 100 करोड़ रुपए प्रति वार्षिक का ब्याज प्राप्त होगा। इसके साथ ही मौजूदा शेयरों पर लाभांश भी मिलेगा, भले ही सरकार इन शेयरों को न बेचे। यदि सरकार इन शेयरों को बेच देती है तब भारत सरकार को, ऊपर बताए गए अनुसार 1424 करोड़ रुपए की प्राप्ति पर (10 प्रतिशत की दर पर) कम से कम 142 करोड़ रुपए प्रति वर्ष प्राप्त होंगे। इस प्रकार, सरकार को 13-20 करोड़ रुपए प्रति र्वा के मौजूदा लाभांश स्तर की तुलना में 242 करोड़ रुपए की न्यूनतम वार्षिक आमदनी होगी।

     

  • सुजुकी द्वारा मूल्य में अभिवृद्धि: संशोधित संयुक्त उद्यम करार में सुजुकी ने निम्नलिखित वचनबद्धता शामिल की है :-
  • सुजुकी, इसके कुछ सार्वभौमिक मॉडलों के लिए मारुति उद्योग लिमिटेड को स्रोत बनाने का प्रयास करेगी।
  • सुजुकी, नए निर्यात बाजारों तक पहुंच बनाने के लिए मारुति उद्योग लिमिटेड की सहायता करेगी।
  • सुजुकी, इसके द्वारा पहले की सहमति के अनुसार कतिपय पूर्जों पर छूट प्रदान करेगी।
  • सुजुकी, मारुति उद्योग लिमिटेड में लागत को और कम करने की सम्भावनाओं का पता लगाने के लिए एक कार्य बल का गठन करेगी।
  • सुजुकी, सार्वभौमिक बाजार में मारुति उद्योग लिमिटेड तथा इसके उत्पादों का संवर्धन करेगी।
  • सुजुकी, मारुति उद्योग लिमिटेड की विनिर्माण और तकनीकी क्षमताओं को उद्यमशीलता के साथ सुदृढ़ करेगी ताकि मारुति उद्योग लिमिटेड के उत्पादों को गुणवत्ता और लागत के सन्दर्भ में अन्तर्राट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धात्मक बनाया जा सके।

यदि भारत सरकार द्वारा पीछे हट जाने के परिणामस्वरूप सुजुकी द्वारा उपर्युक्त गतिविधियां हाथ में ले ली जाती हैं तो न केवल सुजुकी अपितु भारत में भारतीय ऑटोमोबाइल क्षेत्र भी लाभान्वित होगा। मारुति उद्योग लिमिटेड इस समय राट्रीय राजका में हर र्वा लगभग 2500 करोड़ रुपए का योगदान करती है। मारुति उद्योग लिमिटेड के उच्चतर विकास और लाभार्जन के परिणामस्वरूप भी, मारुति उद्योग लिमिटेड से कर के माध्यम से भारत सरकार को अधिक प्राप्तियां होंगी। इसके अलावा, सुजुकी के सभी उपर्युक्त उपाय मारुति उद्योग लिमिटेड के मूल्य में वृद्धि करेंगे और अतः ऊपर आंकलित न्यूनतम प्राप्तियों से कहीं अधिक प्राप्तियों की सम्भावना सुनिश्चित करेंगे।

  • मूल्य गुणक अनुपात का विश्लेषण: इस सौदे को समझने का एक अन्य तरीका यह हो सकता है कि इस मामले में अर्जित लाभ को पहले के विनिवेशों से अर्जित लाभ के साथ परखा जाए। पहले के मामलों में अर्जित लाभ 37 (एच टी एल), 63 (आई बी पी), 11 (वी एस एन एल), 19 (बाल्को), 12 (सी एम सी) और 26 (एच जैड एल) रहा है। यदि हम उपर्युक्त विवेचित सन्तुलित परिदृश्य को लें तो सरकार 49.74 प्रतिशत धारिता के लिए 2424 करोड़ रुपए प्राप्त करती है जिसका अर्थ यह हुआ कि कुल मिलाकर मारुति उद्योग लिमिटेड के लिए 4873 करोड़ रुपए का इक्विटी मूल्य। 2001-2002 में मारुति उद्योग लिमिटेड द्वारा अर्जित लाभ 55 करोड़ रुपए था। यह लगभग 89 का लाभार्जन अनुपात देता है जिसकी पहले के विनिवेश के लाभार्जन के साथ अच्छी प्रकार तुलना की जा सकती है।
     
  • तुलनीय कम्पनियां: ऊपर विवेचित सन्तुलित परिदृश्य को लेते हुए, प्रति शेयर मूल्य लगभग 3684 रुपए बैठता है जो 1.8 के अंकित मूल्य अनुपात का मूल्य होने के परिणामस्वरूप लगभग 2000 रुपए प्रति शेयर के मौजूदा अंकित मूल्य से कहीं अधिक है। यह तीन मूल्य निर्धारकों द्वारा किए गए मूल्य निर्धारण से भी अधिक है। यह इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि ऑटोमोबाइल क्षेत्र की कुछ कम्पनियां इस समय अपने अंकित मूल्य से भी कम मूल्य पर व्यवसाय कर रही हैं ।

बातचीत की पृठभूमि

  • भारत की एक प्रमुख कार विनिर्माता, मारुति उद्योग लिमिटेड भारत सरकार और सुजुकी मोटर कॉर्पोरेशन (सुजुकी) का एक संयुक्त उद्यम है। 31 मार्च, 2001 को समाप्त हुए र्वा की स्थिति के अनुसार मारुति उद्योग लिमिटेड के पास 132.30 करोड़ की इक्विटी पूंजी और 2642 करोड़ रुपए की निवल धन सम्पत्ति थी। भारी प्रतिस्पर्द्धा के कारण मारुति के लाभार्जन पर भारी दबाव पड़ा है।
  • मौजूदा संयुक्त उद्यम करार के अनुसार, मारुति उद्योग लिमिटेड के प्रबंधन पर भारत सरकार और सुजुकी, दोनों का संयुक्त नियंत्रण था और कम्पनी के अध्यक्ष एवं प्रबन्ध निदेशक की नियुक्ति बारी-बारी से की जाती थी। इसके अतिरिक्त, संयुक्त उद्यम करार, सुजुकी की सहमति के बिना मारुति उद्योग लिमिटेड के शेयर किसी तीसरे पक्ष को बेचने से भारत सरकार को प्रतिबंधित करता था। . 
     
  • सरकार ने एक परित्याग विकल्प के साथ मारुति उद्योग लिमिटेड के मौजूदा शेयरधारकों को राइटस आधार पर शेयरों की पेशकश करने के विकल्प के माध्यम से मारुति उद्योग लिमिटेड में विनिवेश करने का निर्णय फरवरी, 2001 में लिया था। सरकार ने, सरकार की ओर से सुजुकी के साथ बातचीत करने के लिए एक वार्ताकार दल का गठन किया था। इस दल में, विनिवेश मंत्रालय के सचिव, भारी उद्योग विभाग के सचिव और आई सी आई सी आई के प्रबंध-निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री के.वी. कामथ सम्मिलित थे। समिति को सुजुकी के साथ बातचीत करने और विनिवेश की रुपात्मकताओं को अन्तिम रूप देने के लिए कहा गया था।

सुजुकी के साथ बैठकें

  • भारत सरकार और सुजुकी के वार्ताकार दल के बीच बैठकों का पहला दौर नई दिल्ली में 02 मार्च, 2001 और 12 मार्च, 2001 के बीच आयोजित किया गया था। विचार-विमर्श के समापन पर, चर्चाओं की एक टिप्पणी पर दोनों पक्षों द्वारा 13 मार्च, 2001 को हस्ताक्षर किए गए। सारांश के रूप में, दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए थे कि मारुति उद्योग लिमिटेड में भारत सरकार के शेयरों के विनिवेश की रूप रेखा दो चरणों में सम्पन्न होगी - प्रथम चरण में राइटस इश्यु और राइटस इश्यु के पूरा हो जाने के बाद, दूसरे चरण में भारत सरकार के मौजूदा शेयरों की बाजार में बिक्री। यह स्वीकार किया गया था कि यह रूप रेखा मारुति उद्योग लिमिटेड के विस्तार और विकास के लिए इसमें अपेक्षित पूंजी लाने में सहायक होगी और साथ ही साथ मारुति उद्योग लिमिटेड के मूल्य में वृद्धि करने और पारदर्शी तरीके से इसके शेयर मूल्य की प्राप्ति में मार्गदर्शन करेगी जिससे आगे के विनिवेश के लिए मानक तय करने में सहायता मिलेगी।
     
  • सहमत राइटस इश्यु का मूल्य 400 करोड़ रुपए था जो मुख्य रूप से मारुति उद्योग लिमिटेड में पूंजी विस्तार की आवश्यकताओं के आधार पर निकाला गया था ।

     

  • मारुति के शेयरों के मूल्य निर्धारण के संबंध में यह सहमति हुई थी कि शेयरों का मूल्य तय करने के लिए भारत सरकार और सुजुकी संयुक्त रूप से तीन प्रतिठित मूल्य निर्धारकों को अभिज्ञात करेंगे और उन्हें नियुक्त करेंगे और वे तीनों मूल्यों के औसत को स्वीकार करेंगे।

     

  • के पी एम जी, अर्नेस्ट एण्ड यंग और एस बी बिलिमोरिया को मूल्य निर्धारकों के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्होंने अपनी मूल्य निर्धारण रिपोर्टें जनवरी, 2002 में प्रस्तुत की, जिनकी प्रतिलिपियां सुजुकी को भी उपलब्ध करवा दी गयी थी। तीनों मूल्य निर्धारकों द्वारा अनुशंसित प्रति शेयर उचित मूल्य केपीएमजी द्वारा 3200 रुपए, अर्नेस्ट एण्ड यंग द्वारा 3142.18 रुपए और एसबी बिलमोरिया द्वारा 3500 रुपए था। तीन अलग-अलग मूल्य निर्धारकों द्वारा किए गए मूल्य निर्धारण का औसत 3280 रुपए निकलता है ।
     
  • मूल्य निर्धारण रिपोर्ट की प्राप्ति के बाद, राइटस, इश्यु किस मूल्य पर किया जाएगा, भारत सरकार के राइटस इश्यु का वह भाग जो सुजुकी द्वारा अभिदत्त किया जाना है और परित्याग प्रीमियम तथा नियंत्रण प्रीमियम और भारत सरकार द्वारा धारित मौजूदा शेयरों की बिक्री की रुपात्मकताओं आदि पर सहमति बनाने के लिए भारत सरकार और सुजुकी के वार्ताकार दल के बीच बैठकों का दूसरा दौर 12 फरवरी, 2002 और 29 अप्रैल, 2002 के बीच नई दिल्ली में आयोजित किया गया था। संशोधित संयुक्त उद्यम करार को अन्तिम रूप देने के लिए भी विचार-विमर्श किया गया था। विचार-विमर्श के समापन पर विचार-विमर्श की एक टिप्पणी पर दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे ।
     
  • कोटक महेन्द्रा केपिटल कम्पनी लिमिटेड ने भारत सरकार के सलाहकार के रूप में कार्य किया। दुआ एण्ड एसोसिएटस सरकार के विधिक सलाहकार थे ।

    "सितंबर, 2005 में सरकार ने (भारत सरकार की 18.28% धारिता में से) 8% धारिता का भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को विनिवेश करने का निर्णय लिया। सरकार ने 8% इक्विटी (2,31,12,804 शेयर) 1567.60 करोड़ रुपए के मूल्य पर बेची थी। प्रतिशेयर भारित औसत 678.24 रुपए थी।"
    31 दिसंबर, 2006 को आर्थिक कार्य संबंधी मत्रिमंडल समिति ने मारूति उद्योग लि. में सरकार के स्वामित्व वाले 10.27% अवशिष्ट इक्विटी का सार्वजनिक क्षेत्र के वित्तीय संस्थानों, भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और भारतीय म्युचुअल फंडों को विनिवेश करने का अनुमोदन किया था। 39 संस्थानों/बैंकों/म्युचुअल फंडों से अभिरूचि की अभिव्यक्तियां 09 मार्च, 2007 को प्राप्त हुई थी। उपरोक्त 39 इच्छुक पार्टियों में से 36 संस्थानों/बैंकों/म्युचुअल फंडों ने वित्तीय बोलियां 08 मई, 2007 को प्रस्तुत की। अंतरीय नीलामी पद्धति के आधार पर 32 संस्थानों/बैंकों/म्युचुअल फंडों को शेयर आबंटित किए गए थे। मारूति उद्योग लि. में 10.27% भागीदारी की बिक्री से सरकार 794.49 रुपए प्रतिशेयर की भारित औसत पर कुल 2366.94 करोड़ रुपए प्राप्त होंगे।

मॉडर्न फूड इण्डस्ट्रीज (इण्डिया) लिमिटेड (एमएफआईएल) एम एफ आई एल वर्ष 1965 में मॉडर्न बेकरीज (इण्डिया) लिमिटेड के रूप में निगमित की गई थी। 31.01.2000 को इसमें 2042 कर्मचारी थे। र्वा 1991-94 के दौरान जब इसका उज्जैन संयंत्र बन्द कर दिया गया, सिल्चर परियोजना छोड़ दी गई और रसिका पेय का उत्पादन कम कर दिया गया तब यह फिर से कार्य चालू करने की समस्या से जुझ रही थी। र्वा 1996 में इस कम्पनी का मामला विनिवेश आयोग के पास भेज दिया गया था। फरवरी, 1997 में आयोग ने कम्पनी को अनुत्पादक क्षेत्र (गैर-कोर सेक्टर) मानते हुए इसकी शत-प्रतिशत बिक्री की सिफारिश की। यह सिफारिश करते समय विनिवेश आयोग ने उत्पादन सुविधाओं के कम उपयोग, बड़े कार्य दल, निम्न उत्पादकता और निर्णय लेने की सीमा पर अंकुश जैसी इसकी कुछ कमजोरियों का उल्लेख किया था।
सितम्बर, 1997 में सरकार ने प्रतियोगी अन्तर्राट्रीय निविदा प्रस्ताव के जरिए नीतिगत भागीदार को 50 प्रतिशत विनिवेश की मंजूरी दी थी। अक्तूबर, 1998 में ए एन जेड निवेश बैंक को विनिवेश में मदद करने के लिए अन्तर्राट्रीय सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया था। जनवरी, 1999 में सरकार ने विनिवेश स्तर को 74 प्रतिशत तक बढ़ाने का निर्णय लिया और भावी नीतिगत भागीदार से रुचि प्रकटीकरण के लिए अप्रैल, 1999 में एक विज्ञापन जारी किया गया था ।
विज्ञापन और सलाहकार द्वारा किए गए अन्य विपणन प्रयासों के अनुरूप 10 पक्षकारों (पार्टियों) ने रुचि का प्रकटीकरण किया। इनमें से केवल 4 पक्षकारों ने कम्पनी के प्रति तत्परता दिखाई थी, जिसके अन्तर्गत उन्होंने डाटा कक्ष का दौरा किया। एमएफआईएल के प्रबंधक वर्ग के साथ बातचीत की और कार्यस्थल का दौरा किया। सम्यक तत्परता दिखाने के बाद केवल 2 पक्षकार ही मैदान में डटे रहे और वित्तीय निविदा प्रस्तुत करने के अन्तिम दिन (15.10.99) केवल हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड (एचएलएल) से ही निविदा प्राप्त हुई। सरकार ने जनवरी, 2000 में नीतिगत भागीदार के रूप में एचएलएल के चयन को अनुमोदित कर दिया और यह संव्यवहार 31.01.2000 को समाप्त हो गया ।
विनिवेश से पूर्व (31.01.2000) अपनाई गई लेखा प्रक्रिया के अनुसार कम्पनी ने यहां तक कि 5 र्वा से अधिक की बकाया वसूलियों के लिए कोई प्रावधान नहीं किया था जबकि कम्पनी ने नए प्रबंधन ने 3 र्वा से अधिक समय की सभी प्रकार की बकाया वसूलियों के लिए इस आधार पर प्रावधान किया है कि लेखा सिद्धान्तों को कड़ाई से लागू करने के लिए ऐसा करने की अनिवार्यता है। इस प्रकार र्वा 1999-2000 के लिए तैयार किए गए लेखे कम्पनी के 201.45 लाख रुपए के निवल मूल्य के साथ 3099.97 लाख रुपए संचित घाटा दर्शाता है। चूंकि ठीक विगत चार वित्तीय वर्षों के दौरान कम्पनी का निवल मूल्य, इसके सर्वाधिक निवल मूल्य ( 1756.79 लाख रुपए) के 50 प्रतिशत से अधिक कम हो गया है, अतः मॉडर्न फूड इण्डस्ट्रीज (इण्डिया) लिमिटेड को, रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1985 की आवश्यकताओं के अनुसरण में औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्संरचना बोर्ड में रिपोर्ट दर्ज करनी पड़ी ।
निम्न तालिका अनुकूल बिक्री की प्रमुख विशेषताओं को दर्शाती हैं :-

 

बिक्री पूर्व (करोड़ रु.में)               

 


बिक्री पश्चात
 

1.

प्राधिकृत शेयर पूंजी
प्रदत्त पूंजी
हानियाँ 1998-99
हानियाँ 1999-00
** (पिछले वर्षों के लिए प्रावधान के प्रति 35.19 करोड़ रुपए की राशि सहित)
कर्मचारियों की संख्याँ

15.00
13.01
6.87
48.23 **

 

2,042

1.

74 प्रतिशत शेयर 105.45 करोड़ रुपए में बेचे गए और कम्पनी में एचएलएल द्वारा 20 करोड़ रुपए और निवेश किए गए।

2.

डीपीई सर्वेक्षण 1998-99 के अनुसार निवल सम्पत्ति (कुल सम्भावित मूल्य)
31.03.99 के लेखों के अनुसार परिसम्पत्ति का निवल मूल्य
सकल
निवल
सरकारी मूल्य निर्धारक के अनुसार भूमि और भवन का बाजार मूल्य (अप्रतिबंधित उपयोग)

28.51
38.76
18.99

109.00

2.

इस प्रकार सरकार ने 1000 शेयरों को 11,490 रुपए में अर्थात अंकित मूल्य के 11 गुणा से भी अधिक और बही मूल्य के 3.68 गुणा मूल्य पर बेचकर लाभ कमाया।

3.

विभिन्न पद्धतियों द्वारा 100 प्रतिशत इक्विटी का मूल्यांकन - अन्तर्राट्रीय सलाहकारों द्वारा किए गए मूल्यांकन के अनुसार

30 to 70

3.

एचएलएल के शेयर का मूल्य जो 30 दिसम्बर (बिक्री से पहले) 2138 रुपए था 25 फरवरी (बिक्री के बाद) को बढ़कर 3247 रुपए हो गया।

 

.

4.

घाटे में चल रही एक कम्पनी के कर्मचारी, एक कुशल कम्पनी एचएलएल कर्मचारी बन गए। शेयरधारक करार में यह उल्लेख किया गया है कि दोनों पक्ष करार करते हैं कि इसमें दी गई तारीख को कम्पनी के सभी कर्मचारी इसी कम्पनी के रोजगार में बने रहेंगे।”

 

 

5

कंपनी औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्संरचना बोर्ड को संदर्भित की गई अब एचएलएल पुनर्संरचना के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करेगी।

निजीकरण के बाद का परिदृश्य

    • मॉडर्न ब्रेड की बिक्री में गिरावट, जो 2000 के आरंभ तक जारी रही, पर काबू पा लिया गया है। दिसंबर, 2000 में साप्ताहिक बिक्री लगभग 44 लाख एसएल थी, जो अप्रैल, 2000 के आंकड़ों से दोगुनी है।
    • 31 दिसंबर, 2000 की स्थिति के अनुसार चालू पूंजी और पूंजीगत व्यय के लिए धन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए एचएलएल ने एमएफआईएल को 16.5 करोड़ रुपए तक का सुरक्षित निगमित ऋण दिया है।
    • एचएलएल ने एमएफआईएल के बैंकर अर्थात पंजाब नेशनल बैंक को निगमित गारंटी प्रदान की है जिससे कंपनी को अपनी पहले की उधार लागत पर 3 से 4% की सीमा तक ब्याज दर को काफी हद तक कम करने में सहायता मिली।
    • ब्रेड की गुणवत्ता, उसकी पैकेजिंग और व्यापार संवर्धन गतिविधियों के साथ विपणन में सुधार करने और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली में लगे कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए कदम उठाए गए हैं।
    • नवबंर, 2002 में वेतन में औसतन 1800 रुपए प्रति कर्मचारी वृद्धि की गई है।
    • स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पर 30 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं और विभिन्न विनिर्माण स्थानों सुरक्षा तथा स्वास्थ्य के लिए 7 करोड़ रुपए लगाए गए हैं।
    • सरकार 31 जनवरी, 2001 से 30 जनवरी, 2003 तक दो वर्षों तक अपनी शेष 26% इक्विटी का उचित बाजार मूल्य पर विक्रय विकल्प उपयोग करने के लिए भी हकदार थी। सरकार ने इस विकल्प का उपयोग किया और उससे 28 नवबंर, 2002 को 44.07 करोड़ रुपए प्राप्त किए।

    पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड (पीपीएल)

    • पारादीप फॉस्फेट्स लिमिटेड दिसंबर, 1981 में निगमित की गई थी।

    31 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार महत्वपूर्ण वित्तीय विवरण (सभी आकड़े करोड़ रुपए में)

    अधिकृत पूंजी

    467.65

    प्रदत्त पूंजी (अब अनुमोदित पुनर्सरंचना सहित)

    432.65 (230 + 117.65 + 85)

    संचित घाटा

    431.50

    निवल मूल्य

    1.15

    2001-02 में अनुमानित घाटा

    120 लगभग
    (वर्तमान निवल मूल्य पहले ही नकारात्मक)

    30 सितंबर, 2001 की स्थिति के अनुसार कर्मचारियों की संख्या

    नियमित कर्मचारी : लगभग 1150
    अनुबंधित श्रमिक : लगभग 1600

    • प्रतिवर्ष निर्माण क्षमता: 7.20 लाख टन डाई एल्युमिनियम फॉस्फेट्स (डीएपी)

                                                                   2.25 लाख टन फॉस्फोरिक एसिड
                                                                   6.60 लाख टन सल्फ्यूरिक एसिड

    • भारत सरकार का कुल ऋण (31 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार): 283.76 करोड़ रुपए (मौजूदा पुनर्संरचना के बाद भी लगभग 200 करोड़ रह जाएगा)
    • मोरक्को के ओसीपी, ट्यूनीशिया के जीसीटी और एमएमटीसी को देय भुगतान के आधार पर बकाया देयता: 856.34 करोड़
      (मोरक्को और ट्यूनीशिया के आपूर्तिकर्ताओं को देनदारियों का भुगतान न करने से भारत के साथ इन देशों के संबंधों पर प्रभाव पड़ा है)
       
    • 1997 से 2001 तक के महत्वपूर्ण वित्तीय आंकड़े


    वर्ष

    बिक्री
      (करोड़ रुपए)

    निवल लाभ >(करोड़ रुपए)

    भा.स. को प्रदत्त लाभांश

    प्रति शेयर अर्जन   (रुपए)

    प्रति शेयर बही मूल्य

    1997-1998

    1,171.35

    (-) 105.52

    शून्य

    नकारात्मक

    नकारात्मक

    1998-1999

    1,005.41

    (-) 57.95

    शून्य

    नकारात्मक

    नकारात्मक

    1999-2000

    890.84

    23.96*

    शून्य

    109.42*

    नकारात्मक

    2000-2001 (अनन्तिम)

    710.87

    (-) 141.02

    -

    नकारात्मक

    नकारात्मक

    * यह कार्यनिष्पादन की बजाय वित्तीय पुनर्संरचना के आधार पर है।

    • चालू वर्ष में कम्पनी हर महीने 10-12 करोड़ रुपए की दर से घाटा उठा रही है ।
    • पीपीएल एक घाटे में चलने वाली कंपनी रही है और वर्ष 1993-94, 1994-95, 1995-96 और 1999-2000 के दौरान तुलन पत्र में लाभ का कारण भारत सरकार के ऋणों पर ब्याज को छोड़ देने और ब्याज से छुटकारा रहा है।
       
    • पीपीएल ने इसकी शुरूआत से ही भारत सरकार के ऋणों पर ब्याज या मूलधन की राशि का सरकार को भुगतान नहीं किया है।
       
    • उड़ीसा के उच्च न्यायालय एक जनहित याचिका में 11 जनवरी, 2002 को आदेश पारित किया था जिसमें कंपनी को 15 फरवरी, 2002 के बाद तब तक निर्माण रोक देने का निर्देश दिया गया था जब तक कंपनी उड़ीसा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देशों के अनुसार प्रदूषण नियंत्रण करने के लिए सभी उपाय न कर ले।
       
    • निम्नानुसार तीन वित्तीय पुनर्संरचनाएं की गई हैं (जिनमें हाल ही में एक अनुमोदित पुनर्संरचना भी शामिल है)

    प्रभावी तारीख

    इक्विटी में परिवर्तन


    बट्टे खाते में डालना

    माफी

    कुल राहत

    पहली पुनर्संरचना
    31 मार्च, 1994

    (i) इक्विटी में 90 करोड़ रु.
    (ii) 117.65 करोड़ रु. अधिमानी पूंजी में परिवर्तित किए गए

    Rs.146.39 करोड़ रुपए

    ऋण के भुगतान में विलंबन और दंड ब्याज की माफी

    Rs. 354 करोड़ रुपए

    दूसरी पुनर्संरचना

    31 मार्च, 2000

    -

    Rs.129.72 करोड़ रुपए

    -

    Rs.129.72 करोड़ रुपए

    तीसरी पुनर्संरचना
    31 मार्च, 2001

    Rs. 85 करोड़ रुपए

    -

    -

    Rs. 85 करोड़ रुपए

    कुल

     

     

     

    Rs. 568.72 करोड़ रुपए

    • पीपीएल जुलाई, 1998 में विनिवेश आयोग को संदर्भित की गई थी। विनिवेश आयोग ने अपने 10वें रिपोर्ट (जून, 1999) में पीपीएल को एक गैर-महत्वपूर्ण कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया था और अन्य बातों के साथ-साथ न्यूनतम 51% इक्विटी की अनुकूल बिक्री की सिफारिश की थी। विनिवेश संबंधी मंत्रिमंडल समिति ने 18 नवंबर, 2000 को अनुकूल बिक्री के माध्यम से 74% इक्विटी के विनिवेश का निर्णय लिया था।
       
    • सार्वजनिक विज्ञापन 27 मार्च, 2001 को इकॉनोमिक टाइम्स, द बिजनेस स्टैण्डर्ड और फाइनेंशियाल एक्सप्रेस में जारी किया गया था, जिसमें संभावित निवेशकों से रूचि की अभिव्यक्तियां आमंत्रित की गई थी। यह विज्ञापन इकोनोमिस्ट लंदन में भी जारी किया गया था। इसके अतिरिक्त, सलाहकारों ने लगभग 125 संभावित बोलीदाताओं को सीधे पत्र भी भेजे थे। रूचि की अभिव्यक्ति की सूचना देने की अंतिम तारीख 15 मई, 2001 थी।
    • मैसर्स टाटा केमिकल्स लि., मैसर्स जुआरी इंडस्ट्रीज लि., मैसर्स राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लि. और मैसर्स ओसवाल फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स लि. ने अपनी रूचि की अभिव्यक्तियां भेजी थीं। इन सभी चार पार्टियों को भागीदारी के लिए योग्य पाया गया था। सभी चार पार्टियों ने संयंत्र के दौरे सहित अपना विधिवत अध्यवसाय पूरा कर लिया था। सुरक्षित सौदा दस्तावेजों के आधार पर तकनीकी तथा वित्तीय बोलीदाताओं ने बोली प्रस्तुतीकरण में भाग लिया था। मैसर्स टाटा केमिकल्स लि. ने वित्तीय बोली प्रस्तुत न करने के अपने निर्णय की सूचना दी थी। मैसर्स जुआरी इंडस्ट्रीज लि. ने अपनी वित्तीय बोली प्रस्तुत की थी। बोलियों के प्रस्तुतीकरण की तारीख 08 फरवरी, 2002 थी और समय सुबह 11.00 बजे था। चार अहर्ताप्राप्त इच्छुक पार्टियों, जिन्होने अपना विधिवत अध्यवसाय पूरा कर लिया था, में से दो पार्टियां थीं मैसर्स टाटा केमिकल्स लि. और मैसर्स जुआरी लि.।
    • विनिवेश संबंधी मंत्रिमंडल समिति ने 14 फरवरी, 2002 को मैसर्स जुआरी मारोक फॉस्फेट्स प्रा.लि. की 151.70 करोड़ रुपए की बोली स्वीकार करने का निर्णय लिया था।
       
    • पी पी एल के कर्मचारी, बोलियां स्वीकार करते समय वेतन संशोधन के लिए आन्दोलन कर रहे थे क्योंकि कम्पनी की खराब हालत के कारण 1997 से देय वेतन संशोधन, प्रभावी नहीं हो पा रहा था।
       
    • नए प्रबंधन ने आश्वासन दिया था कि वेतनमानों का संशोधन उनके अनुकूल साझीदार बनने के 30 दिन के अन्दर क्रियान्वित कर लिया जाएगा और 90 दिनों के अन्दर वे बकाया धनराशि के भुगतान के तौर-तरीकों को अन्तिम रूप दे देंगे। नए प्रबंधन ने मार्च, 2002 से संशोधित वेतन क्रियान्वित कर लिए हैं । इस संशोधन का आशय यह है :-
    • 1140 नियमित कर्मचारियों के लिए प्रति माह 2789 रुपए की औसत वृद्धि
    • औसत वेतन 9360 रुपए से बढ़कर 12419 रुपए प्रतिमाह हो जाएगा (लगभग 28.74 प्रतिशत की वृद्धि)
    • 31.61 लाख रुपए प्रति माह का अतिरिक्त वित्तीय भार (लगभग 3.79 करोड़ रुपए प्रति र्वा)
    • शुरूआत से ही पीपीएल के संयंत्रों ने 40% क्षमता पर कच्चे माल का उत्पादन किया था जो अब 110% की क्षमता पर कार्य कर रहे हैं। उर्वरक का उत्पादन 20,000 मीट्रिक टन से बढ़कर मई-जून, 2002 में 70,000 मीट्रिक टन हो गया है, जो दर क्षमता का 120% होता है।

    विदेश संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनएल)

    विदेश संचार निगम लि. में विनिवेश.

    • सरकार ने, विदेश संचार निगम लिमिटेड में कुल 52.97 प्रतिशत सरकारी शेयरधारिता में से 25 प्रतिशत इक्विटी शेयरधारिता की बिक्री का अनुमोदन 05 फरवरी, 2002 को किया। सरकारी धारिता 151 करोड़ रुपए होने के साथ वी एस एन एल की कुल प्रदत्त पूंजी 285 करोड़ रुपए है। इसमें से 71.25 करोड़ रुपए की इक्विटी, मैसर्स पैनाटोन फिनवेस्ट लिमिटेड (टाटा ग्रुप) को 1439 करोड़ रुपए के मूल्य पर बेच दी गई है।
    • सरकार ने जनवरी, 2001 में वी एस एन एल में विनिवेश करने का निर्णय लिया था और रुचि की अभिव्यक्ति आमंत्रित करने का विज्ञापन फरवरी, 2001 में जारी किया गया था। अनेक इच्छुक पार्टियों ने अपनी रुचि की अभिव्यक्ति प्रस्तुत की थी। विधिवत अध्यवसाय की प्रक्रिया पूरी कर लेने और सौदा दस्तावेजों को सुरक्षित रख लेने के बाद बोलीदाताओं से वित्तीय बोलियां 01.02.2002 को आमंत्रित की गई थी। दो बोलियां प्राप्त हुई थी।
    • एसबीआई केपिटल मार्केटस लिमिटेड और सीएसएफबी को सौदा मूल्य के 0.19 प्रतिशत के शुल्क पर सलाहकारों के रूप में नियुक्त किया गया था। मैसर्स क्राफोर्ड बेले एण्ड कम्पनी ने विधिक सलाहकार के रूप में और प्राइसवाटर हाऊस कुपर्स लिमिटेड ने परिसम्पत्ति मूल्य निर्धारक के रूप में कार्य किया। सलाहकारों की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद मूल्यांकन समिति/अंतर्मंत्रालय दल/सीजीडी ने उच्चतर बोली स्वीकार करने के बारे में सीसीडी को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।
    • सरकार ने वी एस एन एल में विनिवेश की प्रक्रिया से लगभग 3689 करोड़ अर्थात 1439 करोड़ रुपए बोली मूल्य के रूप में, 1887 करोड़ रुपए लाभांश के रूप में और 363 करोड़ रुपए लाभांश कर के रूप में प्राप्त किए हैं। इस प्रकार, सरकार ने अपने शेयर 202 रुपए प्रतिशेयर के मूल्य पर बेचे हैं, लाभांश, विशेष लाभांश और लाभांश कर के रूप में अतिरिक्त राशि भी प्राप्त की है। इसके अलावा सरकार ने वी एस एन एल से अतिरिक्त परन्तु बहुत मूल्यवान भूमि (मूल्य 778 करोड़ रुपए) वापस लेने और सौदा दस्तावेजों में उपबन्धों के माध्यम से भूमि के उपयोग/ बिक्री को प्रतिबंधित करने के भी उपाय किए हैं।
    • 01 फरवरी, 2002 की स्थिति के अनुसार वीएसएनएल के शेयरों का बाजार मूल्य 158 रुपए प्रतिशेयर था। सरकार ने पिछले आठ वर्षों में अपनी 25% इक्विटी पर 10.4 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष अर्जित किए थे। इस वर्ष सरकार ने वीएसएनएल की बिक्री से 3689 करोड रुपए अर्जित किए हैं और यदि इस धनराशि को बैंक में जमा रखा जाए तो इससे 368.9 करोड़ रुपए का ब्याज उपार्जित होगा अर्थात सरकार को प्रतिवर्ष 350 करोड़ रुपए से भी अधिक राशि मिलेगी।
    • अनुकूल साझीदार को 5 वर्षों के लिए इस शर्त पर एक मांग विकल्प की व्यवस्था दी गई है कि सरकार कम से कम एक शेयर और अतः परिसम्पत्तियों पर अपना सकारात्मक मत लागू करने के लिए बोर्ड में एक सीट अपने पास रखे रहेगी। इसके अतिरिक्त, वी एस एन एल की 1.97 प्रतिशत इक्विटी पूंजी रियायती मूल्य पर कर्मचारियों को दी गई है ।